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भारत-चीन में टकराव खत्म नहीं, US कांग्रेस की रिपोर्ट ने बताई अस्थाई शांति

भारत-चीन के बीच संबंधों को बारीकी से नजर रख रहा है अमेरिका. अमेरिका की एक संसदीय समिति के सामने जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स ने खुलासा किया है कि भले ही चीन-भारत के संबंधों में सुधार आया हो, लेकिन दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा जारी है और विश्वास की कमी है.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक चीन का बढ़ता सैन्य प्रभाव, आर्थिक प्रभुत्व और तकनीकी ताकत भारत की रणनीतिक चिंताओं को और बढ़ा रहे हैं. लेकिन भारत खुद अपने बलबूते लगातार खुद को मजबूत कर रहा है.

हालांकि भारत के तेजी से बढ़ते टेक्नोलॉजी और सशक्तिकरण की थिंकटैक ने तारीफ की. कहा, भारत के फैसले तय करेंगे कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र लोकतांत्रिक तकनीकी व्यवस्था के साथ जाएगा या चीनी प्रभुत्व की ओर. 

भारत-चीन के शक्ति संतुलन में कोई बदलाव नहीं: एक्सपर्टस

अमेरिका-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के सामने शिक्षाविदों, थिंक टैंक के विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने कहा, “भारत-चीन को लेकर अपना तर्क दिया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पीछे हटने की प्रक्रिया से भारत-चीन के बीच तुरंत तनाव तो कम हुआ, लेकिन भारत और चीन के बीच शक्ति संतुलन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. हाल की कूटनीतिक संबंधों में गर्माहट के बावजूद नई दिल्ली और बीजिंग के बीच प्रतिस्पर्धा जारी है.”

सैनिक पीछे हटे, लेकिन विवादित क्षेत्रों में चीन का निर्माण जारी: एक्सपर्ट

रणनीतिक विश्लेषक समीर लालवानी ने आयोग को बताया कि “अनिश्चितताओं के बावजूद भारत चीन को एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में ही देखता रहेगा. भारत-चीन सीमा आज भी अत्यधिक सैन्यीकृत है और सैन्य संतुलन चीन के पक्ष में झुका हुआ है.”

लालवानी ने बताया कि “तिब्बत और विवादित क्षेत्रों में चीन की ओर से संरचना का निर्माण जारी है. भले ही सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया हो चुकी हो.तिब्बत में चीन का लगातार बढ़ता बुनियादी ढांचा और किसी संभावित दलाई लामा उत्तराधिकार संकट जैसी राजनीतिक घटना बड़े सैन्य संघर्ष में बदल सकती है.”

भारत-चीन के रिश्तों में अस्थाई गरमाहट: एक्सपर्ट्स

विशेषज्ञ तनवी मंडन ने भारत-चीन के संबंधों को रणनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि सामरिक नरमी करार दिया है. कहा कि “साल 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत में चीन को लेकर भरोसा लगभग खत्म हो चुका है.”

विशेषज्ञों के मुताबिक, “भारत की चिंता अब सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं है. चीन की दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक और आर्थिक मौजूदगी ने नई दिल्ली की सुरक्षा चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है.”

अमेरिका और भारत अकेले चीन से मुकाबला नहीं कर सकते: एक्सपर्ट्स

सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के एक्सपर्ट लिंडसे फोर्ड मे कहा, न तो भारत और न ही अमेरिका अकेले चीन का मुकाबला कर सकता है.

वहीं पूर्व अमेरिकी अधिकारी तरुण छाबड़ा ने भारत को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा का “सबसे अहम स्विंग स्टेट” बताया और कहा कि “भारत को ये तय करना होगा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था हो या वो चीन की ओर जाएगा.”

एक्सपर्ट्स ने ये भी कहा कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संवाद दोबारा शुरू हुआ है, लेकिन अमेरिकी पैनल की सुनवाई ने साफ कर दिया कि भारत-चीन संबंधों का भविष्य सुलह नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा से तय होगा.”

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