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नए थलसेना प्रमुख का ऐलान, बठिंडा से कच्छ तक सनसनी

दुश्मन की सीमा में घुसकर हमला करने वाली स्ट्राइक कोर के कमांडर को सरकार ने देश का नया थलसेना प्रमुख बनाने की घोषणा की है. मौजूदा समय में भारतीय सेना के सह-प्रमुख (वाइस चीफ) लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ, 30 जून को सेना की कमान संभालेंगे. वे थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी की जगह लेंगे, जो सेवानिवृत्त हो रहे हैं.

खास बात है कि करीब तीन दशक बाद, सरकार ने किसी आर्मर्ड कोर यानी टैंक अधिकारी को थलसेना की कमान सौंपी है. आखिरी बार 1997 में जनरल शंकर रॉय चौधरी इस कोर के अधिकारी थे, जिन्होंने सेना की बागडोर संभाली थी. भारतीय सेना में अभी तक इंफेंट्री और आर्टलरी (तोपखाने) के अधिकारियों का चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) के पद पर बोलबाला रहा है. सेना

भोपाल स्थित सुदर्शन चक्र कोर के कमांडर के पद पर रहने के अलावा, लेफ्टिनेंट जनरल सेठ, सेना की दक्षिणी कमान और पश्चिम-दक्षिणी कमान के कमांडर के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. ये दोनों कोर, पंजाब के बठिंडा से लेकर गुजरात के कच्छ तक सटी पाकिस्तानी सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती हैं.

ले.जनरल सेठ के पिता, लेफ्टिनेंट जनरल के एम सेठ भी 1997 में भारतीय सेना के एडजुयटेंट-जनरल के पद से रिटायर हुए थे. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) से पास आउट, ले.जनरल सेठ 1986 में सेना की आर्मर्ड कोर में शामिल हुए थे. करीब 40 वर्षों के अपने कार्यकाल में ले. जनरल सेठ को ऑपरेशन्ल, स्ट्रेटेजिक, कैपेबिलिटी डेवलपमेंट और इंस्टीट्यूशन्ल डोमेन में सेवाएं देना का बड़ा अनुभव है और उन्होंने भारतीय सेना की युद्ध-क्षमता और दीर्घकालिक बदलाव में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. मिड-कैरियर में, लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने राजस्थान के रेगिस्तान में एक आर्मर्ड रेजीमेंट को कमांड किया और जम्मू कश्मीर में भी एक काउंटर-इनसर्जेंसी फोर्स की कमान भी संभाली थी.

नेशनल डिफेंस कॉलेज (एनडीसी) से स्ट्रेटेजिक स्टडी करने वाले, ले.जनरल सेठ ने पेरिस (फ्रांस) से कमांड एंड स्टाफ कोर्स किया है.

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, सेना के आधुनिकीकरण में अपने योगदान के लिए पहचाने जाने वाले ले.जनरल सेठ ने सेना मुख्यालय के रणनीतिक योजना और क्षमता विकास विभागों में अहम पदों पर काम किया है. उन्होंने सेना के आधुनिकीकरण की दिशा, क्षमता विकास के रोडमैप और लंबे समय के लिए सेना की संरचना से जुड़ी पहलों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ऑपरेशनल ज़रूरतों को नई तकनीकों और भविष्य के युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों के साथ तालमेल बिठाने में उनका योगदान बहुत अहम रहा है.

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