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नापाक इस्लामिक NATO, भारत का नहीं बिगाड़ पाएगा कुछ

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पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्किए के साथ मिलकर साइन किया ‘मक्का एग्रीमेंट’. किसी एक पर हमला माना जाएगा तीनों देशों पर हमला. ऐसे में क्या मान लिया जाए कि कोई भी बड़ा आतंकी हमला होने के बाद पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर जैसा कोई ऑपरेशन बेहद मुश्किल हो जाएगा.

सवाल ये भी है कि क्या इन तीनों सुन्नी देशों के ‘इस्लामिक नाटो’ जैसे एलायंस का भारत पर क्या पड़ेगा असर. क्या वाकई ये गठजोड़ भारत के खिलाफ है या ईरान के खिलाफ या फिर इजरायल. 

मक्का-मदीना के दौरे पर सऊदी अरब पहुंचे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस यानी प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान सहित तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के साथ ये डिफेंस एग्रीमेंट किया है. मक्का पैलेस में तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते को दुनियाभर में इस्लामिक नाटो का नाम दिया जा रहा है. क्योंकि ये तीनों इस्लामिक वर्ल्ड के तीन बड़े देश माने जाते हैं.

इस्लामिक नाटो बन जाएगा परमाणु शक्ति गठबंधन, चीन से बड़ी होगी सेना

आखिर ये तीनों देश एक साथ किसके खिलाफ नया गठजोड़ बना रहे हैं, उससे पहले जरा इनकी मिलिट्री पावर पर एक नजर डाल लेते हैं. इन तीनों देशों में पाकिस्तान ऐसा है जिसके पास परमाणु हथियार हैं. ओपन सोर्स इंटेलिजेंस के मुताबिक, पाकिस्तान के पास इस वक्त करीब 170 परमाणु हथियार हैं. ऐसे में इस मिलिट्री अलायंस के पास इतने ही यानी 170 न्यूक्लियर वेपन हो जाएंगे.

इन तीनों देशों की आर्मी को मिला दिया जाए, तो इस इस्लामिक नाटो के कुल सैनिकों की संख्या हो जाएगी करीब 20 लाख यानी करीब-करीब चीन की सेना के बराबर. टैंक हो जाएंगे 07 हजार. आर्मर्ड व्हीकल्स हो जाएंगे 90 हजार. फाइट जेट यानी लड़ाकू विमान हो जाएंगे करीब 1000. इसमें जल्द सऊदी अरब और तुर्की को अमेरिका से मिलने वाले एफ-35 जैसे बेहद एडवांस स्टील्थ फाइटर जेट को जोड़ देंगे तो लड़ाकू विमानों की संख्या और बढ़ जाएगी. युद्धपोत या जंगी जहाज हो जाएंगे करीब 500. पनडुब्बियां हो जाएंगी 30 से ज्यादा.

जियोपॉलिटिक्स में बढ़ सकती है सऊदी, तुर्की और पाकिस्तान की धाक

अगर जियोपॉलिटिक्स की बात करें तो आज टर्की, अमेरिका के अगुवाई वाले नाटो का सदस्य है, सऊदी अरब जी-20 का अहम सदस्य है. ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज यानी ओपेक (ओपीईसी) का प्रमुख इस वक्त सऊदी अरब है. 
लेकिन इस्लामिक मुल्कों का ये कोई नया सैन्य गठबंधन नहीं है. इससे पहले पिछले साल सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक रक्षा समझौता किया था, अब इसी समझौते में खुद को मुस्लिम देशों का खलीफा समझने वाला देश तुर्किए को भी शामिल कर लिया गया है.

ईरान ने करार दिया कागजी समझौता

हालांकि ये समझौता कितना हल्का है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि जब ईरान ने सऊदी अरब पर बार-बार हमला किया तो पाकिस्तान ने कुछ नहीं किया. यहां तक की जब यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर अटैक किया तो पाकिस्तान के फेल्ड मार्शल असीम मुनीर की जुबान से एक शब्द नहीं निकला. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि ये अलायंस फिर किस लिया किया गया है. क्या ये वाकई एक कागजी समझौता है जैसा, ईरान ने मक्का एग्रीमेंट के बाद सबसे पहली प्रतिक्रिया दी है. 

शिया बहुल ईरान के खिलाफ सुन्नी देशों की लामबंदी

सामरिक जानकारों का मानना है कि इन तीनों देशों ने इस अलायंस के जरिए अपने-अपने हित साधने की कोशिश की है. पहला है ईरान के खिलाफ सुन्नी देशों का गठबंधन. जैसा हम जानते हैं कि ईरान एक शिया बहुल देश है. ऐसे में इन तीनों सुन्नी देश यानी पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की ने शिया देश को तीन तरफ से घेरने की कोशिश की है. हालांकि, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच डील कराने की कोशिश की थी, लेकिन वो फेल हो गई थी. ऐसे में अमेरिका और ईरान में जंग जारी है.

अमेरिका और इजरायल जैसे दो मिलिट्री सुपरपावर के खिलाफ जंग में बढ़त बढ़ाने के बाद ईरान के पांव जमीन पर नहीं है. ऐसे में कहीं ईरान, इस्लामिक देशों का नया खलीफा ना बन जाए, सऊदी और तुर्की ने पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाया है.

तुर्की और सऊदी को मजबूरन मिलाना पड़ा हाथ

मुस्लिमों की सबसे दो पवित्र स्थलों, मक्का और मदीना का कस्टोडियन होने के नाते, सऊदी खुद को इस्लामिक देशों का खलीफा समझता है. वहीं नाटो में अहम भूमिका निभाने के चलते, टर्की भी इस्लामिक देशों का एक नया एक्सिस बनाना चाहता था. लेकिन ईरान जंग ने तुर्की का खेल बिगाड़ दिया और मजबूरन सऊदी से हाथ मिलाना पड़ा. पाकिस्तान, अपनी फितरत के मुताबिक, सऊदी, तुर्की और अमेरिका, सभी एक्सिस में बना रहना चाहता है.  परमाणु संपन्न देश होने के चलते, पाकिस्तान को अपने पाले में मिलाना सऊदी और तुर्की की मजबूरी थी. पाकिस्तान के पास एक बड़ी आर्मी भी है, ये फैक्टर भी काम कर गया है. 

तुर्की को इजरायल के हमले का डर

तुर्की को इजरायल से बेहद डर लगता है. एर्दोगन को लगता है कि गाजा, हिज्बुल्लाह और ईरान के बाद, इजरायल का अगला टारगेट तुर्की होगा. ऐसे में तुर्की, अपने साथ सऊदी और पाकिस्तान का मिलाना चाहता है. इजरायल पहले ही सुन्नी देशों के एक्सिस पर चिंता जता चुका है. ऐसे में इजरायल की चिंता सच होती दिखाई देने लगी है. पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए तीनों ने जो मक्का करार किया है, उसके के बाद तीनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि इस्लामिक एकता बनाए रखने के लिए यह समझौता किया गया है. 

पाकिस्तान को भी लगता है इजरायल से डर

अब बात करते हैं कि आखिर पाकिस्तान ने ये डिफेंस समझौता क्यों किया है. पाकिस्तान ने खुलकर ऐसा नहीं कहा है कि उसने ये गठबंधन भारत के खिलाफ किया है. लेकिन समझौते के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का एक बयान सामने आया है. इस बयान में ख्वाजा आसिफ ने इजरायल की तरफ उंगली उठाई. ऐसे में मान सकते हैं कि पाकिस्तान को तुर्की पर इजरायल के हमले की आशंका है. क्योंकि हाल के सालों में अमेरिका की मदद से सऊदी और इजरायल के संबंध लगभग पटरी पर आ चुके हैं.

अगर 7 अक्टूबर 2023 का हमास अटैक नहीं हुआ होता तो सऊदी अरब भी अमेरिका, इजरायल और यूएई के साथ अब्राहम एकोर्ड में शामिल हो गया होता.

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने भारत का क्यों लिया नाम

ख्वाजा आसिफ ने अपने बयान में अफगानिस्तान से होने वाले हमलों का जिक्र भी इस एलायंस का एक बड़ा कारण बताया. लेकिन इस बयान में ख्वाजा आसिफ ने भारत का नाम जोड़ दिया. ख्वाजा आसिफ ने कहा कि भारत समर्थित अफगान लड़ाके पाकिस्तान पर आए दिन हमला कर रहे हैं. ऐसे में पाकिस्तान को अफगानिस्तान के तालिबान से डर लग रहा है. कहीं भारत की मदद से तालिबान शासन, पाकिस्तान पर अटैक ना कर दें.

जैसा हम जानते हैं कि पिछले दो सालों से अफगान लड़ाकों ने पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत में पाकिस्तानी सेना पर हमले कर असीम मुनीर को नाकों चने चबा दिए हैं. पाकिस्तानी सेना इन हमलों के लिए भारत सर्मिथत अफगान लड़ाकों को जिम्मेदार ठहराती आई है. पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर एयर-स्ट्राइक कर तालिबान से संबंधों को तिलांजलि दे दी है.

कैसे होगा ऑपरेशन सिंदूर पार्ट-2

लेकिन सवाल अभी भी बना हुआ है कि अगर आने वाले समय में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने पहलगाम जैसा कोई हमला फिर किया तो क्या भारत ऑपरेशन सिंदूर पार्ट-2 करेगा. तो जवाब है बिल्कुल करेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत के सऊदी अरब से मजबूत संबंध है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सऊदी के क्राउन प्रिंस एमबीएस से जबरदस्त केमिस्ट्री है.

भारत के खिलाफ तुर्किए जरूर पाकिस्तान की मदद कर सकता है. लेकिन वो सीधे अपने सैनिक लड़ने के लिए भेजने की गलती नहीं करेगा. हथियारों से जरूर मदद कर सकता है. ऐसा वो लेकिन पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कर चुका है. पहलगाम हमले के बाद जब पाकिस्तान को भारत के हमले का डर सताने लगा था, तब तुर्किए ने पाकिस्तान के कराची पोर्ट पर अपना एक जंगी जहाज भेज दिया था. इसके अलावा, 8-10 मई के बीच पाकिस्तान ने जिन ड्रोन से भारत पर हमला करने की कोशिश की थी, वे तुर्किए ने सप्लाई किए थे. उस सबके बावजूद, भारत ने पाकिस्तान के 11 एयरबेस पर ब्रह्मोस मिसाइल से अटैक कर तबाह कर दिया था और फिर यु्द्धविराम के लिए पाकिस्तान ने सऊदी और अमेरिका जैसे देशों के सामने गिड़गिड़ाने लगा था पाकिस्तान.

ऐसे में पाकिस्तान किसी मुगालते में ना रहे कि फिर से पहलगाम जैसा हमला होने पर भारत चुपचाप बैठेगा. इस बार भारत की सेनाएं पिछली बार के मुकाबले अधिक घातक वार करेंगी. क्योंकि नूरखान एयरबेस और किराना हिल्स पर अटैक तो महज एक झांकी थी.

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