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नार्को-टेररिज्म के खिलाफ सख्त US, भारत का चाहिए साथ

By Nalini Tewari

भारत और अमेरिका ने मिलकर नार्को टेररिज्म को खत्म करने का प्रण लिया है. संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत ने ड्रग तस्करी और नारको-टेररिज्म के खिलाफ सहयोग को मजबूत करने के लिए एक नया संयुक्त तंत्र शुरू किया है. 

व्हाइट हाउस ने बयान जारी करके कहा है, कि भारत और अमेरिका मिलकर दोनों देशों को ड्रग्स के खिलाफ सुरक्षित बनाएंगे. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने और नशे से जुड़े आतंकवाद को खत्म करने को लेकर समान सोच है.

कुछ महीनों पहले एफबीआई की रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि ड्रग्स आतंकवाद के पीछे चीन का हाथ है. चीन ने 90 प्रतिशत फेंटेनाइल (ड्रग्स) आता है, और चीन, भारत को ट्रांजिट की तरह से इस्तेमाल करता है. अमेरिकी युवा तेजी से इस ड्रग्स के जाल में फंसते जा रहे हैं. ऐसे में अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर ड्रग्स आतंकवाद को खत्म करने के लिए प्रतिबद्धता जताई है.

ड्रग्स आतंकवाद पर ट्रंप-मोदी की समान सोच: व्हाइट हाउस

यूएस-इंडिया ड्रग पॉलिसी एग्जीक्यूटिव वर्किंग ग्रुप की पहली बैठक की गई है. व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान के मुताबिक पहली बैठक 20 से 21 जनवरी तक वाशिंगटन में हुई. 

अमेरिका के राष्ट्रीय ड्रग नियंत्रण नीति कार्यालय की निदेशक सारा कार्टर ने इस बैठक की शुरुआत की. सारा कार्टर ने कहा कि “नशे का संकट अब राष्ट्रीय सुरक्षा का एक बड़ा मुद्दा बन चुका है. यह नया कार्य समूह दोनों देशों की साझेदारी का उपयोग कर परिवारों की सुरक्षा करेगा और साथ ही वैध उद्योगों को भी सहयोग देगा.”

भारत ड्रग्स तस्करी रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है: विनय क्वात्रा

अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने कहा, कि “भारत नशीले पदार्थों की तस्करी से होने वाले खतरे को रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, जिसमें अवैध ड्रग्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्रीकर्सर केमिकल्स के डायवर्जन से निपटना भी शामिल है.” 

विनय क्वात्रा ने कहा कि “भारत मजबूत प्रवर्तन और वैध व्यापार को सुविधाजनक बनाने के बीच संतुलन बनाने पर काम कर रहा है, जिसमें कानूनी फार्मास्युटिकल गतिविधि भी शामिल है.”

वर्किंग ग्रुप की बैठक में किन-किन मुद्दों पर सहमति बनी

भारत और अमेरिका के अधिकारियों ने कहा कि यह समूह ठोस और मापे जा सकने वाले नतीजों पर ध्यान देगा, ताकि नशे के खिलाफ सहयोग को आगे बढ़ाया जा सके. अमेरिका और भारत ने अवैध नशीले पदार्थों और उन्हें बनाने वाले रसायनों के उत्पादन व तस्करी को खत्म करने के लिए मिलकर प्रयास तेज करने पर सहमति जताई. दोनों पक्षों का कहना है कि ये गतिविधियां दोनों देशों के समाज के लिए खतरा हैं. दोनों सरकारों ने इस समस्या से निपटने के लिए पूरे सरकारी तंत्र के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है.

बैठक में इस बात पर सहमति जताई गई कि नार्को आतंकवाद से निपटने के लिए विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है. अधिकारियों ने फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए डायवर्जन को रोकने के प्रयास देश के नियम-कानूनों पर जोर दिया. कहा, इससे वैध उद्योगों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए.

बयान के अनुसार, यह बैठक हाल के उन संयुक्त अभियानों पर आधारित थी, जिनमें नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले नेटवर्क को निशाना बनाया गया था. 

इस बैठक में कहा गया कि भारत-अमेरिका का नया वर्किंग ग्रुप दोनों देशों में सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयास को दर्शाता है. 

इस वर्किंग ग्रुप का नेतृत्व अमेरिकी पक्ष से एक्टिंग ओएनडीसीपी डिप्टी डायरेक्टर डेबी सेगुइन और भारतीय पक्ष से भारत के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की डिप्टी डायरेक्टर जनरल मोनिका आशीष बत्रा कर रही हैं. 

यह पहल ऐसे समय में की गई है, जब दुनिया में कृत्रिम नशों और केमिकल का दुरुपयोग बढ़ा है.

चीन से आता है 90% फेंटेनाइल, एफबीआई ने मांगा था भारत का साथ मदद 

एफबीआई डायरेक्टर काश पटेल ने पिछले साल एफबीआई की एक रिपोर्ट का खुलासा करते हुए चीन पर नार्को आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया था. काश पटेल ने कहा था कि  “90% से अधिक अवैध फेंटेनाइल चीन से आता है, साथ ही मेक्सिको के मेथ के लिए 80% पूर्ववर्ती रसायन भी चीन से आते हैं. विडंबना यह है कि, जबकि चीन सख्त घरेलू नशीली दवाओं पर नियंत्रण लागू करता है, यह दुनिया भर में नशे की लत का निर्यात करता है – अन्य देशों को अस्थिर करने की एक सोची-समझी रणनीति, जैसा कि ब्रुकिंग्स की 2024 की रिपोर्ट में उजागर किया गया है.”

एफबीआई निदेशक काश पटेल ने चीन समर्थित इस नेटवर्क को खत्म करने के लिए भारत-अमेरिका के बीच गहन सहयोग का आह्वान किया. काश पटेल ने कहा कि चीन ड्रग माफिया के इस नेटवर्क को खत्म करने में भारत की भूमिका बेहद अहम है. चीन में तैयार होने वाले फेंटेनाइल के लिए जरूरी रासायनिक कच्चा माल अब भारत जैसे देशों से होकर मैक्सिकन कार्टेल्स तक पहुंच रहे हैं. भारत इसका उपभोक्ता नहीं है, लेकिन अब इसे एक ट्रांजिट रूट के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. 

काश पटेल ने इसे सिर्फ नशे का नहीं, बल्कि एक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा संकट’ बताया था. काश पटेल ने अपनी सरकार को आगाह किया था कि चीन सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि अमेरिका की युवा पीढ़ी को नुकसान पहुंचाने के लिए इस नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भारत इस नेटवर्क को अभी नहीं रोकेगा तो भविष्य में यह भारत के लिए भी खतरा बन सकता है.

क्या है चीन का ड्रग्स रूट, कैसे-कैस दुनिया में फैला रहा कदम

टीएफए ने अपनी इन्वेस्टिगेशन में पाया, बीजिंग से लेकर शंघाई, चेंगदू और वुहान जैसे बड़े शहरों में  फेंटेनाइल  के करीब 100 वेंडर ऑपरेट कर रहे हैं.  शंघाई में आज 13 ऐसे वेंडर हैं जो इस ड्रग्स का धंधा करते हैं तो वुहान में 14. शिझाहजजुआंग में तो ऐसे 47 वेंडर हैं.  

चीन की कंपनियां खुले-आम गैर कानूनी ड्रग्स का धंधा ऑनलाइन कर रही हैं. इनमें सबसे ज्यादा बिजनेस  फेंटेनाइल का ही किया जाता है. फेंटेनाइल कितनी घातक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र दो मिलीग्राम के सेवन से किसी भी व्यक्ति की जान जा सकती है.

एक अनुमान के मुताबिक, चीन में 40 हजार से ज्यादा दवा और उससे जुड़े केमिकल के वैध और अवैध निर्माता हैं. इनमें से बड़ी संख्या में दवा की आड़ में नारकोटिक्स ड्रग्स का धंधा करते हैं.

दुनियाभर में ड्रग्स को भेजने का काम चीन खुद नहीं करता है. इसके बजाए चीन ने म्यांमार के शान और कचिन प्रांतों को चुना है. म्यांमार के ये दोनों प्रांत चीन सीमा से सटे हुए हैं और अशांत हैं. इन दोनों प्रांतों में म्यांमार की जुंटा (मिलिट्री शासन) का शासन लगभग न के बराबर है. यहां पर विद्रोही संगठनों ने एकछत्र राज कायम किया हुआ है.

म्यांमार के शान और कचिन से ही चीन की ड्रग्स की खेप पहले दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक पहुंचती है और फिर समंदर के रास्ते वहां से दुनिया के अलग-अलग देशों तक स्मगलिंग के जरिए पहुंचाई जाती है.

म्यांमार के अशांत प्रांतों के अलावा चीन ने लाओस से सटे 100 किलोमीटर बॉर्डर को भी ड्रग्स की तस्करी के लिए खास तौर से चुना है. लाओस के सीमावर्ती इलाकों में चीन के तस्कर, बिजनेस के आड़ में गैर-कानूनी तरीके से नारकोटिक्स ड्रग्स का धंधा करते हैं. यही वजह है कि लाओस के इस क्षेत्र को ‘लिटिल-चायना’ का नाम दे दिया गया है.

चीन के शैडो बैंक से आती है पेमेंट, अमेरिका ने किया खुलासा

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस की एक रिपोर्ट की मानें तो दक्षिण-पूर्व एशिया में ड्रग्स की तस्करी में 78 प्रतिशत अकेले चीन से ही आती है. यही वजह है कि अमेरिका जैसे देशों ने चीन की उन कंपनियों को बैन कर दिया है जो फेंटेनाइल का धंधा करती हैं.

एफबीआई के अलावा अमेरिका की डायरेक्टरेट ऑफ एनफोर्समेंट एजेंसी (डीईए) का भी आरोप है कि पड़ोसी देश मैक्सिको से जो 90 प्रतिशत मेथामफेटामाइन  (मेथ) आती है, उसमें से 80 प्रतिशत के लिए प्रीकर्सर-केमिकल चीन से ही आता है. मेथ एक सिंथेटिक-ड्रग्स है जो पब और रेव पार्टियों में इस्तेमाल की जाती है.

मैक्सिको के अलावा इटली भी चीन की ड्रग्स की चपेट में आने की कगार पर है. इटली के ड्रग कार्टेल चीन के शैडो बैंक से आने वाली पेमेंट को छिपाने की कोशिश करते पाए गए हैं.

मेथ के आदी बन रहे युवा, म्यांमार भी अछूता नहीं

एक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में करीब 35 मिलियन (3.50 करोड़) लोग मेथ की आदी बन चुके हैं. लेकिन ड्रैगन का चायना-व्हाइट, मेथ से भी 100 गुना ज्यादा घातक माना जाता है. चीन ने फेंटेनाइल से लैस ड्रग्स के उत्पादन को जबरदस्त तरीके से अपने देश में बढ़ा दिया है. मालदीव तक ‘चायना-व्हाइट’ की चपेट में आ चुका है. चीन के गैरकानूनी ड्रग्स के धंधे के लिए मालदीव आज एक ‘ट्रांस-शिपमेंट हब’ बन चुका है. चीन की फेंटेनाइल आज मालदीव से ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और थाईलैंड सहित फिलीपींस पहुंचती है. इसके चलते मालदीव के युवा भी नशे की आदी बनते जा रहे हैं. 

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