अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और यूएस इंडो पैसिफिक कमान के कमांडर एडम सैमुअल जे पापारो के भारतीय सेना के पश्चिमी कमान का किया है दौरा. पश्चिमी कमान (चंडीगढ़, चंडीमंदिर) भारतीय सेना की वही कमान है, जिसका ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अहम रोल रहा है.
अमूमन ऐसा नहीं होता है कि कोई राजनयिक सेना के कमान का दौरा करे, लेकिन सर्जियो गोर ने अपने अमेरिकी सैन्य कमांडर के साथ भारतीय सेना के पश्चिमी कमान (चंडीगढ़, चंडीमंदिर) का दौरा करके चौंका दिया है.
अमेरिकी राजदूत और अमेरिकी सैन्य अफसर के इस दौरे पर सियासत भी शुरु हो गई है. विपक्ष ने गोर के विजिट पर सवाल खड़े किए हैं और अमेरिका-पाकिस्तान के संबंधों के कारण संवेदनशील कमान के दौरे को असमान्य भी कहा है.
गोर ने ली ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी, पहुंचे पश्चिमी कमान
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने जिस दिन से नई दिल्ली में कमान संभाली है, एक्शन में हैं. सोमवार को सर्जियो गोर ने एक्स पर ये पोस्ट करके सभी को हैरानी में डाल दिया कि वो वेस्टर्न कमांड पहुंच रहे हैं. गोर ने एक्स पर लिखा, अभी-अभी चंडीगढ़ पहुंचा हूं. भारतीय सेना के वेस्टर्न कमांड का दौरा करने के लिए उत्साहित हूं.
भारतीय सेना के मुताबिक अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और यूएस इंडो पैसिफिक कमान के कमांडर एडम सैमुअल जे. पापारो ने पश्चिमी कमान के मुख्यालय का दौरा किया और लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार, कमांडर, पश्चिमी कमान के साथ भारत के पश्चिमी मोर्चे के साथ रणनीतिक सुरक्षा पर चर्चा की.
प्रतिनिधिमंडल को पश्चिमी मोर्चे के दृष्टिकोण पर जानकारी दी गई, ऑपरेशन सिंदूर में किस तरह से एक्शन लिया गया इसके बारे में भी जानकारी दी गई. जनरल मनोज कटियार ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में आर्मी ने कैसे काम किया.
भारत के पश्चिमी कमान को समझें, ऑपरेशन सिंदूर में थी अहम भूमिका
पश्चिमी कमान (चंडीमंदिर) पंजाब और राजस्थान सेक्टर संभालती है, जो पाकिस्तान सीमा के पास है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी कमान की भूमिका बेहद अहम रही थी.
ये पाकिस्तान के साथ लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा की रक्षा करती है. पाकिस्तान के साथ-साथ चीन यानि यह एक साथ टू फ्रंट वॉर की चुनौती को संभालने में अहम भूमिका निभाती है. ये वो कमान है, जिसने 1947, 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान को शिकस्त दी थी.
1971 के युद्ध के दौरान इसी कमांड के नेतृत्व में पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान को रोका गया था. कारगिल युद्ध के दौरान भी इस कमान का अहम रोल रहा था.
भारत और अमेरिका के बीच सैन्य साझेदारी, क्वाड के अहम पार्टनर्स
हाल के दिनों में भले ही अमेरिका-भारत के बीच तल्खी रही हो, लेकिन धीरे-धीरे संबंध सामान्य किए जा रहे हैं. अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पार्टनर के रूप में देखता है. अमेरिका का मानना है कि चीन को इस क्षेत्र में रोकने के लिए भारत सशक्त साझेदार है.
साउथ चाइना सी और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के खिलाफ भारत और अमेरिका क्वाड जैसे संगठन में एकजुट हैं.
अमेरिकी दूतावास का कहना है कि ऐसे विजिट से दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे से सीखती हैं और वैश्विक शांति के लिए साथ काम करती हैं.
सेना के वेस्टर्न कमांड जाने से पहले सेमुअल पपारो इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) हेडक्वॉर्टर भी गए. आईडीएस ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर सेमुअल पपारो ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान से मुलाकात की. इस दौरान भारत और यूएस के बीच मजबूत और लगातार बढ़ती साझेदारी पर बात हुई. दोनों ने सैन्य सहयोग बढ़ाने, एक दूसरे की सेनाओं के साथ तालमेल और जॉइंट ऑपरेशनल क्षमताओं को मजबूत करने पर भी विचार-विमर्श किया.
गोर के दौरे विपक्ष ने सवाल उठाए, वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों ने लिखा कि अमेरिकी राजदूत और सैन्य अधिकारी को संवेदनशील और अहम लोकेशन पर विजिट नहीं कराना चाहिए था. लेकिन आपको बता दें कि ये कोई पहला मौका नहीं है कि किसी राजदूत ने भारतीय सेना के कमान को दौरा किया हो.
इससे पहले पूर्व अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी (2023-2025) ने भी 2024 में नौसेना मुख्यालय और अन्य सैन्य जगहों का दौरा किया था.
साल 2019 में भी अमेरिकी राजदूत ने पूर्वी कमान (ईस्टर्न कमांड) का दौरा किया था.
यूपीए सरकार हो या फिर मौजूदा मोदी सरकार भारत-अमेरिका या अन्य देशों के डिफेंस अटैची से लेकर राजदूत सैन्य अधिकारियों से मिलते रहे हैं और जानकारियां हासिल करते रहे हैं. भारत-अमेरिकी सेना तो हर वर्ष ज्वाइंट मिलिट्री एक्सरसाइज भी करती है.

