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श्रीलंका ने नहीं उतरने दिए अमेरिकी एयरक्राफ्ट, ईरान जंग में दिखाई तटस्थता

ईरान के साथ चल रहे युद्ध में श्रीलंका ने अमेरिका को अपनी जमीन पर जंगी जहाजों को उतारने की अनुमति नहीं दी है. ये जानकारी खुद श्रीलंकन राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके ने दी है.

ईरान जंग के दौरान अमेरिका अपने दो युद्धक विमानों को श्रीलंका के दक्षिणपूर्व मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंड करना चाहता था. लेकिन राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने अमेरिका को इसकी अनुमति नहीं दी.

श्रीलंकन राष्ट्रपति ने ये जानकारी संसद में दी है. साथ ही कहा है कि इस फैसले के पीछे श्रीलंका की तटस्थता है. श्रीलंका इस युद्ध में तटस्थ रहना चाहता है, ना कि किसी के दबाव में आना चाहता है.

आपको बता दें कि ईरानी युद्धपोत डेना को जब अमेरिका ने टारगेट किया था तो श्रीलंका की नेवी ही मदद के लिए हिंद महासागर में उतरी थी. कई ईरानी नौसैनिकों की जान बचाई गई, को कई शवों को चुपचाप तेहरान को सौंपा था.

हम किसी दबाव में नहीं झुकेंगे, तटस्थ रहेंगे: अनुरा दिसानायके

अमेरिका-ईरान युद्ध में अपने तटस्थ नीति को संसद में घोषणा करते हुए राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने कहा कि “जिबूती से अमेरिका के दो युद्धक विमानों ने 4 और 8 मार्च को श्रीलंका में उतरने की इजाजत मांगी थी. लेकिन अमेरिका के ये दोनों अनुरोध अस्वीकार कर दिए गए.”

अनुरा दिसानायके ने कहा, “कई दबावों के बावजूद हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं. हम झुकेंगे नहीं. मध्य-पूर्व का युद्ध चुनौतियां खड़ी करता है, लेकिन तटस्थ बने रहने के लिए हम हम हर संभव प्रयास करेंगे.”

“वे जिबूती के एक बेस से आठ एंटी-शिप मिसाइलों से लैस दो लड़ाकू विमान मट्टाला इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लाना चाहते थे, और हमने साफ मना कर दिया.”

श्रीलंका किसी भी युद्ध में पक्ष नहीं लेना चाहता

राष्ट्रपति दिसानायके ने जोर दिया कि “श्रीलंका किसी भी युद्ध में पक्ष नहीं लेना चाहता. मध्य पूर्व संकट से समुद्री व्यापार, पर्यटन और ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. फिर भी, देश अपनी संप्रभुता और तटस्थता को सर्वोपरि रखता है. दिसानायके ने कहा, “हमारा लक्ष्य शांतिपूर्ण विश्व निर्माण में योगदान देना है. सभी पक्षों से अपील है कि वो जल्द से जल्द शांति की ओर बढ़ें.”

दिसानायके ने कहा, यही नीति हमारी ईरान के साथ भी रहेगी.

सर्जियो गोर से हुई अनुरा दिसानायके की मुलाकात

राष्ट्रपति दिसानायके का यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया के लिए विशेष दूत सर्जियो गोर के साथ राष्ट्रपति दिसानायके की मुलाकात के ठीक एक दिन बाद आया है. दोनों नेताओं के बीच हुई चर्चा में महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा, बंदरगाहों को मजबूत बनाने, आपसी हित वाले व्यापारिक और वाणिज्यिक संबंधों को और गहरा करने तथा एक स्वतंत्र, खुले और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई है. अमेरिकी पक्ष ने इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है.

अमेरिका ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना को श्रीलंका के तट पर डुबोया था

ईरान के साथ युद्ध के शुरुआती दिनों में अमेरिकी सेना ने भारत से ईरान लौट रहे युद्धपोत डेना पर टॉरपीडो से हमला किया था. सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद ये पहला मौका था जब अमेरिका ने ऐसे किसी युद्धपोत को समंदर में डुबोया था. इस हमले में 84 नाविक मारे गए, जबकि 32 को बचा लिया गया. इस दौरान श्रीलंका की नेवी ने ही राहत-बचाव कार्य चलाया. घायल ईरानी नौसैनिकों को अस्पताल में भर्ती कराया तो मारे गए ईरानी नौसैनिकों के शव को सम्मानपूर्वक तेहरान सौंपा था.

6 मार्च को एक दूसरे ईरानी जहाज़, ‘आइरिस बुशेहर’,  200 से ज्यादा नाविकों के साथ कोलंबो बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति मांगी. इंजन खराबी का हवाला देकर श्रीलंका से मदद मांगी. श्रीलंका ने मानवीय आधार पर इसे अनुमति दी. 204 ईरानी नाविकों को अब कोलंबो के पास स्थित नौसैनिक सुविधा केंद्र में ठहराया गया है.

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