By Nalini Tewari
मुस्लिम देशों के लेकर इजरायल और यूरोप की आशंका सच साबित हो रही है. मक्का समझौते के बाद इस्लामिक नाटो बनाने की कवायद और तेज हो गई है. पाकिस्तान, तुर्किए, कतर और इंडोनेशिया यानि 04 मुस्लिम देशों ने मिलकर बद्र समझौता किया है. इस समझौते के तहत चारों देश मिलकर हथियार बनाएंगे. सैन्य तकनीकि साझा करेंगे और डिफेंस सेक्टर में ट्रेनिंग-रिसर्च के लिए साथ-साथ आएंगे.
हालांकि मक्का पैक्ट कितना पानी में है, ये तो सऊदी अरब और यमन की हूतियों की लड़ाई में दुनिया के सामने आ ही चुका है कि ये समझौता नाममात्र का ही है, क्योंकि सऊदी अरब जिस तरह से हमले झेल रहा है, हूतियों को रोकने वाला कोई नहीं है, जबकि समझौते में कहा गया था कि एक देश पर हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा.
बहरहाल कतर की राजधानी दोहा में पाकिस्तान, तुर्किए, कतर और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रियों ने एक साथ आकर बद्र डील पर मुहर लगाई है.
कतर में मुस्लिम देशों ने किया बद्र समझौता
मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए, कतर और इंडोनेशिया ने हाथ मिलाया है. चारों मुस्लिम देशों ने एक दूसरे के साथ मिलकर एक रक्षा मसौदा तैयार किया है, जिसे नाम दिया गया है बद्र पैक्ट. इस समझौते का मुख्य उद्देश्य चारों देशों के बीच रक्षा तकनीक, रणनीतिक साझेदारी और आपसी सहयोग को और अधिक मजबूत बनाना है.
दोहा में हुए इस करार के दौरान तुर्किए के रक्षा मंत्री यासर गुलेर, कतर के उप प्रधानमंत्री एवं रक्षा मामलों के राज्य मंत्री शेख सऊद बिन अब्दुल रहमान बिन हसन अल थानी, इंडोनेशिया के उप रक्षा मंत्री यूसुफ जौहरी और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ मौजूद रहे. इस दौरान तुर्किए, के रक्षा उद्योग प्रेसीडेंसी के प्रमुख हलूक गोरगुन भी मौजूद थे.
कतर के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, “इस समझौते के तहत चारों देश अपने संसाधनों, तकनीक, कामगारों और निवेश का इस्तेमाल एक-दूसरे की मदद के लिए करेंगे. समझौते का उद्देश्य सैन्य उत्पादन में सहयोग बढ़ाना, रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना और तकनीकी सैन्य प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है.”
वेस्ट पर निर्भरता कम करने के लिए एकजुट हो रहे मुस्लिम देश
पिछले कुछ वर्षों से दुनिया उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. आए दिन नए-नए मोर्चे पर युद्ध लड़ी जा रही है. ऐसे में हथियारों के उत्पादन और आयात-निर्यात में बढ़ोतरी देखी गई है. लेकिन अमेरिका जैसे देश अगर किसी हथियार को निर्यात करते हैं तो उसके इस्तेमाल पर कड़ी पाबंदियां लगी होती हैं. मसलन अगर पाकिस्तान ने अमेरिका से लड़ाकू विमान खरीदे हैं तो उसके इस्तेमाल से पहले पाकिस्तान को अमेरिका को जानकारी देनी होगी. ऐसे में पाकिस्तान जैसे देश जो आतंकियों को पालते-पोसते हैं उनपर कड़ी निगरानी रहती है.
ऐसे में मुस्लिम देश आपस में मिलकर ऐसे समझौते करने की जुगत में हैं ताकि वेस्ट पर हथियारों की निर्भरता कम की जा सके.
मक्का समझौता तो कागज़ी निकला, सऊदी अरब अलग-थलग पड़ा
पाकिस्तान-तुर्किए मिलकर मुस्लिम देशों को एक मंच पर भले ला रहे हों, लेकिन ये समझौते महज कागज़ी दिख रहे हैं. अगस्त के महीने में मक्का समझौता किया गया, लेकिन दो महीने के अंदर ही ये फेल रहा, क्योंकि जब सऊदी अरब यमन के हूतियों के हमले झेल रहा था तो पाकिस्तान हो या फिर तुर्किए सिर्फ बयानबाजी करते दिखे. मदद के लिए कोई नहीं पहुंचा.
पाकिस्तान अगर सीधे तौर से हूतियों के हमलों का जवाब देता तो ईरान से दुश्मनी मोल ले लेता, क्योंकि हूतियों को ईरान का खुला समर्थन है. वहीं तुर्किए के सैनिकों को विदेश में तैनात करने के लिए संसद की अलग से मंजूरी जरूरी होती है, इस समझौते को मंजूरी के लिए अभी तुर्किए की संसद में खींचतान ही चल रही है.
ऐसे में रियाद को अकेले छोड़ पाकिस्तान और तुर्किए बद्र पैक्ट की ओर बढ़ चुके हैं. पाकिस्तान-सऊदी अरब और तुर्किए के कागज़ी मक्का पैक्ट के बाद मुस्लिम बाहुल्य देशों की साझेदारी बढ़ रही है, जो आने वाले समय में गैर मुस्लिम देशों के लिए चिंता का सबब बन सकती है.


Leave feedback about this