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ब्रह्मोस की ASEAN में जबरदस्त डिमांड, थाईलैंड ने दिखाई खरीदने में दिलचस्पी

फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया के बाद अब एक और आसियान देश भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का मुरीद हो गया है. वो देश है थाईलैंड. वही थाईलैंड, जिसका छह महीने पहले कंबोडिया से भीषण युद्ध हुआ था.

पिछले महीने, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया के दौरे पर गए थे, तब दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को लेकर एक अहम करार हुआ था. उससे पहले वियतनाम ने भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का समझौता किया था.

पिछले तीन साल से फिलीपींस ने साउथ चायना सी से सटे तटीय इलाकों में भारतीय ब्रह्मोस को तैनात कर रखा है ताकि समुद्री-सीमाओं को दुश्मन के जंगी जहाजों से सुरक्षित रखा जा सके. वर्ष 2023 में भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल के एंटी-शिप वर्जन की तीन बैटरियां निर्यात की थी. इस सौदे की कीमत करीब 2700 करोड़ की थी. ऐसे में फिलीपींस ने अपने समुद्री-तट पर इन ब्रह्मोस मिसाइल को सफलतापूर्वक तैनात कर रखा है.

पिछले एक साल में थाईलैंड का कंबोडिया से हुआ 02 बार युद्ध

अब चौथा देश जो ब्रह्मोस खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहा है, वो है थाईलैंड. थाईलैंड भी भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस खरीदने की तैयारी कर रहा है. पिछले साल दो बार यानी जुलाई और दिसंबर 2025 में थाईलैंड का पड़ोसी देश कंबोडिया से एक हिंदू मंदिर को लेकर युद्ध हुआ था. इस युद्ध में दोनों तरफ के करीब 100 लोगों की मौत हुई थी और लाखों की तादाद में लोग बेघर हुए थे.

हिंदू मंदिर पर कब्जे को लेकर भिड़े हैं थाईलैंड और कंबोडिया

करीब एक हजार वर्ष पुराने प्रिहा विहार नाम के एक हिंदू मंदिर पर कब्जे को लेकर दोनों देशों के बीच कई दशकों से सीमा-विवाद रहा है. ऐसे में आने वाले समय में ये विवाद समंदर तक ना पहुंच जाए, थाईलैंड, भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदना चाहता है. हालांकि, चीन, अमेरिका और मलेशिया जैसे देशों की मदद से थाईलैंड और कंबोडिया में युद्धविराम हो गया था, लेकिन तनातनी जारी है. दोनों देशों की समुद्री सीमाएं भी सटी हैं. ऐसे में अपने समुद्री-तटों की सुरक्षा के लिए थाईलैंड, ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहा है.

हाल के अमेरिका-ईरान जंग और रूस-यूक्रेन जंग में जिस तरह समंदर में युद्ध लड़ा जा रहा है, ऐसे में समुद्री-सीमाओं और समुद्री-तटों की सुरक्षा बेहद अहम हो जाती है. 

ब्रह्मोस क्यों है गेमचेंजर

दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, ब्रह्मोस को भारत ने रूस की मदद से देश में ही तैयार किया है. ब्रह्मोस भारत का प्राइम स्ट्राइक वैपेन है जिसे भारत की सबसे लंबी नदी ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा नदी के नामों को मिलाकर ब्रह्मोस नाम दिया गया है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल के एयर-वर्जन को पाकिस्तान के 11 एयरबेस को तबाह करने के लिए सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसलिए बढ़ी ब्रह्मोस की मांग

ऑपरेशन सिंदूर के बाद, ब्रह्मोस मिसाइल की जबरदस्त डिमांड है. इसका एक बड़ा कारण ये है कि पाकिस्तान ने अपनी एयर-स्पेस की सुरक्षा के लिए चीन की एयर डिफेंस मिसाइल को खरीद रखा है. लेकिन ब्रह्मोस मिसाइल के हमले के दौरान चीनी एयर डिफेंस सिस्टम, काउंटर करना तो दूर सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को डिटेक्ट तक नहीं कर पाई. पाकिस्तान को ब्रह्मोस मिसाइल के हमले की जानकारी तबाही के बाद मिल पाई. 

दुनिया की कोई रडार नहीं पकड़ पाती भारत के ब्रह्मास्त्र को

माना जाता है कि दुनिया की कोई रडार, हथियार या फिर मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस को इंटरसेप्ट नहीं कर सकता है यानी एक बार ब्रह्मोस को दाग दिया तो ब्रह्मास्त्र की तरह इसे कोई नहीं रोक सकता है और अपने टारगेट को तबाह करके ही दम लेती है.

कई आसियान देशों का चीन से है समुद्री-विवाद

ब्रह्मोस मिसाइल में सबसे पहले फिलीपींस ने दिलचस्पी दिखाई थी और जैसा हमने बताया कि 2023 में ब्रह्मोस मिसाइल का सौदा किया था. फिलीपींस का साउथ चायना सी में चीन के साथ समुद्री विवाद रहा है. आए दिन, दोनों देशों की नौसेनाएं और कोस्टगार्ड के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती रहती है. यही वजह है कि फिलीपींस ने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदी हैं.  फिलीपींस की तरह ही इंडोनेशिया का भी साउथ चाइना सी को लेकर चीन से तनातनी चल रही है. ऐसे में भारत से ब्रह्मोस मिसाइल का करार मायने रखता है. इंडोनेशिया से महज कुछ हफ्ते पहले एक तीसरे दक्षिण-पूर्व एशियाई देश वियतनाम ने भी गुपचुप तरीके से भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का सौदा किया था.  

भारत का प्राइम स्ट्राइक वेपन है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल भारत के उन चुनिंदा हथियारों (मिसाइलों) में से एक है जिसे थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों ही इस्तेमाल करती हैं. वायुसेना के फ्रंटलाइन एयरक्राफ्ट, सुखोई में भी ब्रह्मोस मिसाइल को इंटीग्रेट कर दिया गया है.थलसेना की आर्टलरी यानि तोपखाना भी ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल करता है. नौसेना के युद्धपोतों को भी ब्रह्मोस से लैस कर दिया गया है. जिससे नौसेना के शिप और अधिक घातक बन गए हैं और समंदर से जमीन तक पर टारगेट करने में सक्षम बन गए हैं.

पीएम मोदी का मेक फॉर द वर्ल्ड सपना हुआ साकार

एक के बाद एक ब्रह्मोस मिसाइल को दूसरे देशों द्वारा खरीदना ये भी दिखाता है कि भारत के स्वदेशी हथियारों की डिमांड दुनियाभर में बढ़ रही है. पीएम मोदी के मेक फॉर द वर्ल्ड प्रोजेक्ट के तहत आज भारत खुद के हथियार बनाने के साथ-साथ मित्र-देशों को हथियार सप्लाई भी कर रहा है. यही वजह है कि भारत का रक्षा निर्यात लगातार बढ़ रहा है. आज भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट करीब 38 हजार करोड़ पहुंच गया है. रक्षा मंत्रालय ने अगले तीन वर्षों में यानी 2028-29 तक इसके 50 हजार करोड़ पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है.

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