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अमेरिकी नंबर-1 आर्मी क्यों पस्त, ईरान को कमतर समझना पड़ा भारी!

दुनिया की सुपर-पावर अमेरिका और मिलिट्री पावर इजरायल को क्यों लगेंगे ईरान को घुटनों पर लाने के लिए 04-05 हफ्ते. ये सवाल पूरी दुनिया  के मन में उठ रहा है.

ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की सेना की रैंकिंग अगर नंबर वन है तो ईरान 16वें पायदान पर है. अमेरिका के साथ मिलिट्री टेक्नोलॉजी में महारत माने जाने वाला देश इजरायल भी है, जिसकी रैंकिंग 15 नंबर पर है. अमेरिका का डिफेंस बजट 961 बिलियन डॉलर है तो ईरान का महज 1 प्रतिशत यानी 10 बिलियन डॉलर. इसके बावजूद, ईरान ने अमेरिका और इजरायल सहित पूरे अरब-वर्ल्ड की नाक में दम कर दिया है. क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच कोई जमीनी बॉर्डर नहीं है, ऐसे में माना जा सकता है कि दोनों देशों में अगर कोई जंग होती है तो वो समंदर या फिर आसमान के जरिए, नॉन-कॉन्टेक्ट हो सकती है. ऐसे में दोनों देशों की नौसेना और वायुसेना का आंकलन बेहद जरूरी है.

अमेरिका नंबर वन सेना, ईरान 16वें पर फिर क्यों खिंच रहा संघर्ष

अमेरिका के पास है 20 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं. समंदर में तैरते ये ऐसे विशाल मिलिट्री बेस हैं, जिनपर दर्जनों एफ-18 सुपर होरनेट लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं. इसके अलावा अमेरिका के पास 450 से ज्यादा जंगी जहाज हैं. वहीं ईरान के पास महज 279 जंगी जहाज है और कोई भी विमानवाहक युद्धपोत नहीं है.

ईरान से हुए तनाव के बाद, अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और अरब सागर में अपने एक न्युक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ अदन की खाड़ी की घेराबंदी की है ताकि ईरान को घेरा जा सके. इसके अलावा एक दूसरा विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस गेराल्ड फोर्ड, इजरायल के बेहद करीब भूमध्यसागर में तैनात कर दिया है.

अमेरिका के पास 70 पनडुब्बियां हैं तो ईरान के पास 25 सबमरीन हैं. इन पनडुब्बियों के जरिए ईरान की नौसेना, अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर और जंगी जहाजों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है है. हालांकि, पिछले छह दिनों में ईरान के 20 जंगी जहाज और एक पनडुब्बी तबाह हो चुकी है.

ईरान की आईआरसीजी का भी अपना नेवल विंग है, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशो के ऑयल टैंकर पर हमला कर रही है. आईआरसीजी ने स्ट्रेट ऑफ होरमुज का नेवल ब्लॉकेड कर फारस की खाड़ी के सभी देशों से निर्यात होने वाले कच्चे तेल की सप्लाई पर रोक लगा दी है, जिससे दुनियाभर में ऑयल संकट गहरा सकता है.

अमेरिकी वायुसेना की ताकत जानिए

अमेरिकी वायुसेना के पास 13 हजार लड़ाकू विमान, सर्विलांस एयरक्राफ्ट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, टैंकर (रिफ्यूलिंग) और हेलीकॉप्टर हैं तो ईरान के पास महज 1000 एयरक्राफ्ट हैं. यूएस एयरफोर्स के खेमे में दुनिया के आधुनिकतम और सबसे खतरनाक माने जाने वाले एफ-22 और एफ-35 जैसे स्टील्थ एयरक्राफ्ट हैं, तो दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में जाने वाले सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट हैं. वहीं ईरानी वायुसेना के पास 80 के दशक के रूसी मिग-29 और ट्रेनर एयरक्राफ्ट के साथ 70 के दशक के पुराने अमेरिकी एफ-14 फाइटर जेट हैं. दुनिया की अब कोई भी वायुसेना इन एफ-14 का इस्तेमाल नहीं करती है.

पिछले वर्ष जून में अमेरिका ने ईरान के जिन परमाणु संयंत्रों पर हमला किया था, उसके लिए इन्हीं एफ-22 और एफ-35 फाइटर जेट का इस्तेमाल किया था, जिन्हें दुनिया की कोई भी रडार या फिर सर्विलांस सिस्टम ट्रैक करना तो दूर डिटेक्ट तक नहीं कर पाई थी. अमेरिका ने एफ-35 फाइटर जेट को इजरायल को भी दे रखा है.

ईरान के पास घातक मिसाइलें, जो पड़ रहीं अमेरिका पर भारी

ईरान अगर अमेरिका से किसी मामले में भारी पड़ सकता है तो वो है, मिसाइल और ड्रोन. भले खाड़ी के देशों में अमेरिका की कई मिलिट्री ठिकाने हैं, लेकिन जमीन से मार करने वाली मिसाइल कम हैं. यही वजह है कि अमेरिका, अपनी जंगी जहाजों से टॉमहॉक मिसाइलों को ईरान पर दाग रहा है. ईराक के जिस ईरबिल मिलिट्री बेस से अमेरिका ने ईरान पर टॉमहॉक मिसाइल दागी थी, उस पर ईरान ने हमला कर बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है.

ईरान के पास बैलिस्टिक से लेकर हाइपरसोनिक मिसाइल हैं का एक बड़ा जखीरा है. माना जाता है कि रूस और चीन की मदद से इन मिसाइलों को ईरान ने बेहद गुपचुप तरीके से तैयार किया है. इनमें फतह, खैबर, जुलफगहार, शबाब, गदर और कोरामशहर शामिल हैं. इन मिसाइलों के जरिए ईरान ने पिछले साल इजरायल के खिलाफ 12 दिन वाले युद्ध का रूख मोड़ दिया था और एक बार फिर अमेरिका और इजरायल सहित सभी खाड़ी देशों की रातों की नींद उड़ा दी है. माना जा रहा है कि ईरान के पास इन मिसाइलों का एक बड़ा जखीरा है, जिसे ईरान के बेहद सीक्रेट बेस पर तैनात कर रखा है. इसके अलावा इन मिसाइलों को चलते-फिरते मोबाइल लॉन्चर से दागा जाता है, जिससे इन्हें डिटेक्ट और ट्रैक करना थोड़ा मुश्किल होता है.

ईरान के पास दुनिया के सबसे घातक शहीद (या शहेद-136) ड्रोन हैं, जिसने यूक्रेन के खिलाफ रूस के लिए जंग का रूख मोड़ दिया था. और अब एक बार फिर इन आत्मघाती शहीद ड्रोन ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ अपना लोहा मनवाया है.

इन शहीद ड्रोन के जरिए ही ईरान, अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर से लेकर जंगी जहाज और यूएई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, बहरीन सहित करीब एक दर्जन देशों पर हमला कर रहा है. इनमें से अधिकतर यूएस मिलिट्री बेस पर हमले किए गए हैं. यही कामीकाजी ड्रोन, यमन के हूती विद्रोहियों ने अमेरिका के जंगी जहाज और एमक्यू-9 प्रीडेटर ड्रोन के खिलाफ इस्तेमाल करे पहले से नाक में दम कर रखा है. इन हिती विद्रोहियों को भी ईरान से ड्रोन की सप्लाई हो रही है.

क्या अमेरिका और इजरायल भांप नहीं पाए ईरान की ताकत?

अमेरिका ने भले ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई सहित टॉप मिलिट्री और पॉलिटिकल लीडरशिप का सफाया कर दिया है, बावजूद इसके ईरान जंग जारी रखे हुए हैं. इसके पीछे बड़ा कारण ये है कि ईरान ने अपनी सैन्य ताकत का डि-सैंट्रेलाइजेशन कर रखा है. इसके मायने ये हैं कि ईरान ने अपनी फील्ड फोर्मेशन्स और फील्ड कमांडर्स को पहले से साफ दिशा-निर्देश दिए थे, कि चेन ऑफ कमांड टूटने पर उन्हें कैसे दुश्मन से बदला लेना है.

ईरान एक घायल शेर की तरह लगातार अटैक कर रहा है, जिसके कारण खाड़ी देश त्रस्त हैं. अजरबैजान और तुर्किए तक को झेलना पड़ रहा है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इजरायल और अमेरिका इस बात को भांप नहीं पाए. दोनों देशों को लगा था कि सुप्रीम लीडर और मिलिट्री अधिकारियों के मारे जाने के बाद ईरान सरेंडर मोड में होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ईरान ने तो एक साथ कई मोर्चे पर जंग छेड़ दी, कई देशों से दुश्मनी मोल ले ली है. ऐसे में अमेरिका और इजरायल को समझ आ गया है कि युद्ध को खत्म होने में अभी 4-5 हफ्ते लग सकते हैं.

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