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सेना को मिलेंगी 4.25 लाख कार्बाइन, शोले फेम की फाइनली विदाई

द्वितीय विश्वयुद्ध की कार्बाइन को आखिरकार पूरी तरह विदाई देने का वक्त आ गया है. क्योंकि रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए 4.25 लाख आधुनिक क्लोज क्वार्टर कार्बाइन बनाने का करार किया है. ये करार भारत फोर्ज और पीएलआर सिस्टम्स (अडानी ग्रुप) के साथ किया गया है.

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, भारतीय सेना और नौसेना के लिए 2770 करोड़ रुपये के 4.25 लाख से अधिक क्लोज क्वार्टर बैटल कार्बाइन और सहायक उपकरणों के अनुबंध पर भारत फोर्ज लिमिटेड और पीएलआर सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ हस्ताक्षर किए गए. मंगलवार को ये अनुबंध राजधानी दिल्ली स्थित साउथ ब्लॉक में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में संपन्न हुआ.

भारत फोर्ज ने डीआरडीओ की मदद से बनाई स्वदेशी सीक्यूबी

माना जा रहा है कि इस अनुबंध में 2000 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट, पुणे की भारत फोर्ज कंपनी के साथ हुआ है. भारत फोर्ज ने डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) के साथ मिलकर स्वदेशी 5.56×45 मिमी सीक्यूबी कार्बाइन तैयार की है.इस कार्बाइन गन के डिजाइन को बनाने में पुणे स्थित डीआरडीओ की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट ने अहम भूमिका निभाई है. ये कार्बाइन बेहद हल्की होने के साथ-साथ कॉम्पैक्ट और बेहद ही सशक्त है. क्लोज क्वार्टर यानी नजदीकी लड़ाई में इसका कोई तोड़ नहीं.

अडानी की पीएलआर सिस्टम्स ने इजरायल की मदद से बनाई ग्वालियर में कार्बाइन

पीएलआर सिस्टम्स कंपनी को वर्ष 2021 में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस कंपनी ने खरीद लिया था. इस कंपनी में इजरायल की आईडब्लूआई (इजरायल वेपन इंडस्ट्रीज) की भी हिस्सेदारी है. ग्वालियर स्थित पीएलआर कंपनी के प्लांट में मेक इन इंडिया के तहत इजरायली हथियारों का निर्माण किया जाता है.  

इन दोनों करार के बाद, रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि यह उपलब्धि ‘आत्मनिर्भर भारत’ की विजन के अंतर्गत भारतीय सैनिकों को विश्व-स्तरीय मारक क्षमता से लैस करने और पुरानी प्रणालियों को अत्याधुनिक स्वदेशी तकनीक से बदलने के असाधारण और निरंतर प्रयासों की परिणति है.

आर्मी ऑफिसर्स का बनेगी सर्विस-वेपन

आधुनिक इन्फेंट्री यानी पैदल सेना के शस्त्रागार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के नाते, क्लोज क्वार्टर बैटल कार्बाइन अपने कॉम्पैक्ट डिजाइन और उच्च मारक क्षमता के कारण निकटवर्ती युद्ध में निर्णायक बढ़त प्रदान करती है, जिससे सीमित स्थानों में भी त्वरित और निर्णायक मारक क्षमता सुनिश्चित होती है. यह अनुबंध सरकार और निजी क्षेत्र के बीच तालमेल को दर्शाता है, जिससे मेक-इन-इंडिया पहल को और गति मिलेगी.

सीक्यूबी यानी क्लोज क्वार्टर बैटल कार्बाइन खासतौर से नजदीकी लड़ाई के लिए बनाई है. मसलन युद्ध के क्षेत्र में या फिर आतंकियों के एनकाउंटर के वक्त जब दुश्मन के साथ आमने सामने की लड़ाई हो रही हो तो ये कार्बाइन बेहद असरदार रहेगी. ये हल्की होने के साथ-साथ तेज और छोटी है.  इसका वजन सिर्फ महज किलो के आसपास है. ऐसे में ये हथियार सैनिक (और सैन्य अधिकारियों) के सर्विस-वेपन के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा ताकि लंबे समय तक इसे आसानी से कंधे पर टांगा जा सके. इसकी विशेषता की बात की जाए तो यह कार्बाइन कॉम्पैक्ट और अत्यधिक प्रभावी है, जो इसे विशेष बलों और आतंकवाद विरोधी इकाइयों के लिए एक आदर्श हथियार बनेगी.

शोले में दिखाई दी थी द्वितीय विश्वयुद्ध वाली कार्बाइन

नई सीक्यूबी, द्वितीय विश्वयुद्ध की स्टर्लिंग कार्बाइन (‘शोले’ फिल्म वाली) को रिप्लेस करेगी. भारतीय सेना में मौजूदा समय में 1940 में डिजाइन की गई सब मशीन गन स्टर्लिंग कार्बाइन का उपयोग किया जाता है. जिसके बाद डीआरडीओ की एआरडीई ने नई कार्बाइन बनाने पर काम शुरू किया.  

सेना में हालांकि, कुछ वर्षों से पुरानी कार्बाइन का इस्तेमाल लगभग बंद कर दिया गया था लेकिन पीस-क्षेत्रों में अभी भी कहीं कहीं ये सैनिकों के हाथों में दिखाई पड़ जाती थी. 

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