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सेना के 90 प्रतिशत गोला-बारूद अब स्वदेशी, 16 हजार करोड़ के ऑर्डर तैयार

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर भले चार दिनों में समाप्त हो गया था, लेकिन नव वर्ष में भारतीय सेना लंबे चलने वाले युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रही है. इसके लिए सेना विदेशी गोला-बारूद के बजाए स्वदेशी एम्युनिशन पर निर्भर हो रही है. जानकारी के मुताबिक, भारतीय सेना अब 90 प्रतिशत स्वदेशी गोला-बारूद इस्तेमाल कर रही है और आत्मनिर्भरता के जरिए खुद को मजबूत कर रही है.

आयात पर निर्भरता घटाकर और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर भारतीय सेना अपनी दीर्घकालिक संचालन क्षमता और आत्मनिर्भर तैयारी को सशक्त बनाने में जुटी है. पिछले चार से पांच वर्षों में खरीद प्रक्रिया को सरल और प्रतिस्पर्धी बनाया गया है ताकि अधिक घरेलू कंपनियां आगे आ सकें. मेक इन इंडिया के तहत करीब 16 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर विभिन्न चरणों में हैं. वहीं, पिछले तीन वर्षों में लगभग 26 हजार करोड़ रुपये के गोला-बारूद की आपूर्ति के ऑर्डर भारतीय कंपनियों को दिए गए हैं. इससे आपूर्ति व्यवस्था अधिक मजबूत और भरोसेमंद बनी है.

भारतीय सेना करती है 200 प्रकार के गोला-बारूद का इस्तेमाल

भारतीय सेना अपने विभिन्न हथियार प्रणालियों के लिए लगभग 200 प्रकार के गोला-बारूद और सटीक हथियारों का उपयोग करती है. नीति सुधारों और उद्योग के साथ समन्वय के चलते इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक गोला-बारूद अब देश में ही तैयार किए जा रहे हैं. शेष श्रेणियों पर भी तेजी से काम चल रहा है, जिसमें अनुसंधान संस्थान, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी उद्योग की भागीदारी है.

गोला-बारूद बनाने वाली बड़ी प्राइवेट कंपनियों की रक्षा क्षेत्र में हिस्सेदारी को सुनिश्चित करने के लिए अगले 7-10 वर्षों तक के लगातार ऑर्डर देने का आश्वासन दिया गया है. यही वजह है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और टॉप मिलिट्री लीडरशिप एक लंबे युद्ध के लिए सेना को तैयार रहने का आह्वान कर रही है. हालांकि, इस बात को लेकर सहमति है कि भारत कभी भी युद्ध का पक्षधर नहीं रहा है. लेकिन पहलगाम हमले जैसी कोई दूसरी घटना के जरिए छेड़ा गया तो दुश्मन को किसी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी भी आतंकी घटना को युद्ध की तरह मानने का ऐलान कर दिया है. 

दरअसल, भारत की सुरक्षा स्थिति समय के साथ बदल रही है. नई तकनीक, वैश्विक घटनाक्रम और लंबे समय तक चलने वाली चुनौतियों के बीच यह जरूरी हो गया है कि सेना हर परिस्थिति के लिए तैयार रहे. आज सैन्य तैयारी केवल आधुनिक हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक अभियानों को संभालने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

मेक इन इंडिया गोला-बारूद

युद्ध या किसी भी सैन्य अभियान में गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और लॉजिस्टिक्स रीढ़ की तरह काम करते हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने गोला-बारूद के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को अपनी तैयारी का अहम आधार बनाया है.

पहले गोला-बारूद की आपूर्ति काफी हद तक पुराने उत्पादन ढांचे और विदेशी स्रोतों पर निर्भर थी. वैश्विक स्तर पर आई बाधाओं के दौरान यह निर्भरता एक चुनौती के रूप में सामने आई. हाल के अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से यह साफ हुआ है कि जिन देशों के पास घरेलू स्तर पर उत्पादन की मजबूत व्यवस्था होती है, वे लंबे समय तक अपनी तैयारी बनाए रख पाते हैं। इसी सोच के तहत भारतीय सेना आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया – मेक फॉर द वर्ल्ड के लक्ष्य के अनुरूप आगे बढ़ रही है.

भारतीय सेना के मुताबिक, आने वाले समय में जोर इन प्रयासों को और मजबूत करने पर रहेगा. कच्चे माल की घरेलू उपलब्धता बढ़ाना, प्रोपेलेंट और फ्यूज जैसे अहम हिस्सों का विकास, उत्पादन ढांचे का आधुनिकीकरण, तकनीक का तेज हस्तांतरण और कड़े गुणवत्ता मानक इस दिशा में प्रमुख कदम होंगे.

गोला-बारूद के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से भारतीय सेना अपनी दीर्घकालिक तैयारी, परिचालन क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती प्रदान कर रही है। यह प्रयास न केवल वर्तमान जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करता है.

पिछले 10 वर्षों में रिजर्व वॉर-स्टोर बढ़ाने पर जोर, कभी था महज 10 दिनों का एम्युनिशन

पिछले 10 वर्षों में भारत के रिजर्व वॉर-स्टोर में जबरदस्त इजाफा हुआ है. ज्यादा पुरानी बात नहीं हैं, जब तत्कालीन थलसेना प्रमुख (अब मिजोरम के राज्यपाल) जनरल वीके सिंह (रिटायर) ने सरकार को चिट्ठी लिखकर याद दिलाया था कि सेना के पास महज दस दिनों के गोला-बारूद बचा है.

एक समय में सरकारी उपक्रम, ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) ही सेना को गोला-बारूद सप्लाई कर सकती थी. प्राइवेट कंपनियों की भागीदारी लगभग निल थी. मोदी सरकार की मेक इन इंडिया नीति के तहत आज सरकारी कंपनियों (पूर्ववर्ती ओएफबी) के साथ-साथ अडानी डिफेंस, सोलर इंडस्ट्रीज, एसएमपीपी और भारत-फोर्ज जैसी करीब 20 ऐसी निजी क्षेत्र की कंपनियां हैं जो हथियारों के साथ-साथ गोला-बारूद और दूसरा एम्युनिशन बना रही हैं. 

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