नौ की लकड़ी, 90 का खर्च…ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका का कुछ यही हाल है. ईरान के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका के 20% एमक्यू-9 रीपर ड्रोन नष्ट हो चुके हैं. आकंड़ों के मुताबिक आईआरजीसी ने अमेरिका के 24 से 30 रीपर ड्रोन को ध्वस्त कर डाला है, जिसके कारण अमेरिका को लगभग 1 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है.
सिर्फ इतना ही नहीं ईरानी मिसाइलों से इजरायल की रक्षा करने के लिए अमेरिका ने अपने लगभग आधे एडवांस एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम थाड का इस्तेमाल कर लिया है. ईरान का सामना करने के लिए अमेरिका ने 200 से ज्यादा थाड इंटरसेप्टर दाग डाले, जो पेंटागन के कुल स्टॉक का आधा है.
गोलीबारी और मिसाइल हमलों में नष्ट हुई रीपर ड्रोन
ईरान के साथ जारी सीजफायर और किसी भी वक्त शुरु होने वाले युद्ध से पहले एक रिपोर्ट ने अमेरिका के होश उड़ा दिए हैं. ईरान के साथ संघर्ष के दौरान अमेरिका के कम से कम 24 से 30 खतरनाक एमक्यू-9 रीपर ड्रोन नष्ट हो चुके हैं. ये ड्रोन गोलीबारी या मिसाइलों की शिकार हो गए हैं. कई ड्रोन तो पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं, तो कुछ क्षतिग्रस्त ड्रोन को बेकार घोषित कर दिया गया है.
रिपोर्ट बताती है कि ईरानी मिसाइलों ने अमेरिका के कुछ रीपर ड्रोन्स को हवा में मार गिराया तो कुछ को जमीन पर खड़े रहने के दौरान टारगेट किया.
अमेरिका के रीपर ड्रोन का नुकसान युद्ध से पहले भंडार में मौजूद हाईवैल्यू मानवरहित ड्रोन का 20 प्रतिशत है.
अमेरिका में रीपर ड्रोन का उत्पादन बंद, नुकसान बड़ा
खास बात है कि एमक्यू-9 रीपर का उत्पादन अब अमेरिकी बलों के लिए नहीं हो रहा है, इसलिए नष्ट किए गए हर ड्रोन को फैक्ट्री से बदला नहीं जा सकता. युद्ध के दौरान एमक्यू 9 रीपर ड्रोन अमेरिकी सेना का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाला ड्रोन है. इसे जनरल एटॉमिक्स ने बनाया है. प्रत्येक ड्रोन की कीमत 30 मिलियन डॉलर है और इसमें उच्च-शक्ति वाले सेंसर, हेलफायर मिसाइलें और सटीक-निर्देशित बम लगे होते हैं. एमक्यूल 9 का बेड़ा सीमित है और घट रहा है और अमेरिकी सैन्य उपयोग के लिए कोई नए निर्माण अनुबंध मौजूद नहीं हैं.
जनरल एटॉमिक्स द्वारा निर्मित प्रोपेलर-चालित रीपर ड्रोन का उत्पादन अब अमेरिका के लिए बंद हो चुका है. इसके बाद विकसित हुए जेट-चालित एवेंजर स्ट्राइक ड्रोन की केवल लगभग 10 इकाइयाँ ही बनाई गईं. रीपर के कुछ वेरिएंट अभी भी विदेशी ग्राहकों के लिए उत्पादित किए जा रहे हैं.
1 अरब डॉलर के रीपर मिसाइल के नुकसान से ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के युद्ध की लागत और बढ़ गई है, जिसमें टोमाहॉक और जैसम-ईआर क्रूज मिसाइलों सहित हजारों उच्च श्रेणी के गोला-बारूद का इस्तेमाल हो चुका है.
42 सैन्य विमान-ड्रोन का नुकसान, युद्ध महंगा पड़ा
अमेरिका के ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान ईरान में कम से कम 42 अमेरिकी सैन्य विमान और ड्रोन क्षतिग्रस्त या नष्ट हो गए. कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें एफ-15ई, एफ-35ए जैसे लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और एमक्यू-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं. इन विमानों में लड़ाकू जेट, हेलीकॉप्टर और एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट भी शामिल हैं.
सीआरएस की रिपोर्ट के मुताबिक ऑपरेशन के दौरान जिन विमानों को नुकसान पहुंचा या जो नष्ट हुए, उनमें चार एफ-15ई स्ट्राइक ईगल फाइटर जेट, एक एफ-35ए लाइटनिंग II फाइटर एयरक्राफ्ट, एक ए-10 थंडरबोल्ट II ग्राउंड अटैक एयरक्राफ्ट, सात केसी-135 स्ट्रैटोटैंकर एयर रिफ्यूलिंग विमान, एक ई-3 सेंट्री एडब्ल्यूएसीएस विमान, दो एमसी-130जे कमांडो II स्पेशल ऑपरेशन एयरक्राफ्ट, एक एचएच-60डब्ल्यू जॉली ग्रीन II हेलीकॉप्टर, 24 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और एक एमक्यू-4सी ट्राइटन ड्रोन शामिल हैं.
आपको बता दें कि सीआरएस अमेरिकी कांग्रेस और उसकी समितियों को नीति और कानूनी मामलों पर विश्लेषण उपलब्ध कराती है.
अमेरिका ने आधे से ज्यादा थाड इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया
रीपर ड्रोन का नुकसान ही नहीं थाड इंटरसेप्टर के मोर्चे पर भी अमेरिका को बड़ा झटका लगा है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका ने इजरायल को बचाने के लिए 200 से ज्यादा थाड इंटरसेप्टर दागे, जो कुल स्टॉक का करीब-करीब आधा हिस्सा है. दावा किया गया कि ईस्टर्न मेडिटेरन सी में तैनात नेवी के जहाजों से भी 100 से अधिक स्टैंडर्ड मिसाइल-3 और स्टैंडर्ड मिसाइल-6 इंटरसेप्टर दागे गए. हालांकि, इसकी तुलना में इजरायल ने 100 से कम एरो इंटरसेप्टर और लगभग 90 डेविड स्लिंग इंटरसेप्टर का प्रयोग किया.
अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका ने कुल मिलाकर करीब 120 ज्यादा इंटरसेप्टर दागे और ईरानी मिसाइलों को रोकने के लिए दोगुना ज्यादा एक्शन किया. दावा किया गया है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आने वाले दिनों में एक बार फिर से ईरान पर सैन्य कार्रवाई का आदेश देते हैं तो अमेरिकी सेना को और ज्यादा इंटरसेप्टर दागने पड़ सकते हैं, जो एक चुनौती है.
वही एक रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि ईरान युद्ध के बाद अमेरिकी भंडार को फिर से भरने में 6 साल लग सकते हैं.

