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सेना की IBG तैयार, जनरल रावत का सपना पूरा

देश के पहले सीडीएस (स्वर्गीय) जनरल बिपिन रावत (2020-21) का सपना पूरा होने जा रहा है. एक ऐसा सपना जिससे भारतीय सेना की तैयारियों को जबरदस्त धार मिलेगी और जंग के दौरान दुश्मन के हौंसले पस्त होंगे. क्योंकि भारतीय सेना ने अपनी सबसे नई मिलिट्री फोर्मेशन, इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी) को तैयार कर उत्तर-पूर्व में चीन सीमा के करीब तैनात कर दिया है.

ब्रह्मास्त्र कोर के अंतर्गत खड़ी की गई 05 आईबीजी

इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप को सेना ने सबसे नई स्ट्राइक कोर, माउंटेन स्ट्राइक कोर, जिसे 17वीं कोर या ब्रह्मास्त्र के नाम से जानता जाता है, उसके अंतर्गत खड़ा किया गया है. इस माउंटेन स्ट्राइक कोर का हेडक्वार्टर, पश्चिम बंगाल के पानागढ़ में है और इसका एरिया ऑफ रेस्पोंसोबिलिटी (एओआर), उत्तर-पूर्व से सटी पूरी चीन सीमा है. ऐसे में सेना ने शुरूआत में पांच (05) आईबीजी को इस माउंटेन स्ट्राइक कोर के तहत तैयार किया है. 

जनरल रावत के दिमाग की उपज थी आईबीजी

सिक्किम से सटे चीन बॉर्डर पर डोकलाम विवाद के बाद तत्कालीन थलसेना प्रमुख (बाद में सीडीएस) जनरल रावत ने सेना की रणनीति में बदलाव लाने की कोशिश की थी. वर्ष 2017 में चीन की पीएलए सेना ने सिक्किम से सटे डोकलाम में घुसपैठ की कोशिश की थी. लेकिन भारतीय सेना ने 72 दिनों तक चीनी सेना को डोकलाम में बांध कर रखा था. आखिरकार चीनी सेना को पीछे हटना पड़ा था. लेकिन इस विवाद के बाद 2019 में भारतीय सेना ने आईबीजी बनाने की तैयारी शुरू की.

ब्रिगेड से बड़ी हैं आईबीजी फॉर्मेशन

आईबीजी, सेना के एक ब्रिगेड से थोड़ी बड़ी फॉर्मेशन है. लेकिन इसमें इंफैन्ट्री के साथ-साथ टैंक, आर्टिलरी, आर्मी एविएशन जिसमें (अटैक हेलीकॉप्टर सहित) भी हिस्सा होते हैं और एयर-डिफेंस भी शामिल हैं. इसके अलावा ड्रोन यूनिट को भी इन आईबीजी का हिस्सा बनाया गया है. ठीक वैसे जैसे कि किसी डिवीजन में होती हैं. यही वजह है कि आईबीजी का कमांडर भी एक मेजर जनरल रैंक का अधिकारी बनाया गया है.

जनरल रावत क्यों बनाने चाहते थे आईबीजी

जनरल रावत आईबीजी इसलिए बनाना चाहते थे, क्योंकि शांति-काल में स्ट्राइक कोर सीमा से दूर तैनात रहती हैं युद्ध की परिस्थितियों में उन्हें बॉर्डर पर भेजने में एक लंबा समय लग जाता है. स्ट्राइक कोर, वे कोर होती हैं जो जंग के समय में दुश्मन की सीमा में घुसकर हमला करती हैं. जबकि दूसरी कोर जो होती हैं, उनका डिफेंसिव रोल होता है. वे सीमा पर यथास्थिति बनाने का कार्य करती हैं कि कहीं दुश्मन सीमा पर घुसपैठ कर हमारा क्षेत्र ना हथिया सकें.

स्ट्राइक कोर की खामियां हुई दूर

स्ट्राइक कोर, क्योंकि रिजर्व फोर्स की तरह होती हैं, ऐसे में उन्हें ऑपरेशन्ल एरिया से दूर तैनात किया जाता है. लेकिन इनकी लोकेशन इनकी कमी भी बन जाती है. यही वजह है कि जनरल रावत ने आईबीजी बनाने का प्लान तैयार किया था.

आईबीजी अपने छोटे स्वरूप के चलते तेजी से बॉर्डर पर दुश्मन के खिलाफ लोहा लेने के लिए तैयार रह सकती है. जनरल रावत ने वर्ष 2019 में पहली बार चीन के खिलाफ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ऐसे आईबीजी ग्रुप को तैनात करने का मसौदा तैयार किया था. लेकिन सत साल बाद भी इसे अमली-जामा पहनाया गया है. आखिर क्यों हुई आईबीजी बनाने में देरी, उस पर भी बात करेंगे. लेकिन पहले बात कि आखिर इन आईबीजी को कहां तैनात किया गया है. 

क्योंकि सेना की ऑपरेशन्ल तैनाती, क्लासीफाइड होती है, ऐसे में हम आपको इन आईबीजी की सटीक लोकेशन नहीं बता सकते हैं. लेकिन इतना बता सकते हैं कि ये सभी माउंटेन स्ट्राइक कोर के ऑपरेशन्ल एरिया में तैनात की गई है. इसके तहत, दुश्मन के खिलाफ पूरी स्ट्राइक कोर को सीमा पर भेजने के बजाए आईबीजी के छोटे-छोटे ग्रुप में बदलकर स्थायी तौर से तैनात कर दिया जाएगा.

आईबीजी को बनाने में सात साल का लंबा वक्त क्यों लगा

दरअसल, सेना के मूलभूत ढांचे में बदलाव के लिए सरकार से परमिशन की जरूरत होती है. क्योंकि इसके लिए नए अधिकारियों से लेकर वित्तीय खर्च भी पड़ता है. ऐसे में ब्यूरोक्रेसी की तरफ से आईबीजी को बनाने में थोड़ा अड़ंगा जरूर लगाया गया था. लेकिन जब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सार्वजनिक तौर से अपनी नाराजगी जाहिर की तब जाकर सरकार ने रीस्ट्रक्चरिंग के लिए इजाजत दी. 

सेना ने जिंदा रखा जनरल रावत का सपना

साफ है कि सेना ने जनरल रावत की मौत के बाद भी आईबीजी का प्लान जिंदा रखा और अब उसे चीन सीमा पर ट्रायल के तौर पर तैनात कर दिया है. माना जा रहा है कि चीन सीमा पर ट्रायल सफल रहने के बाद पाकिस्तान सीमा पर ऐसी आईबीजी तैनात की जाएंगी.

सीडीएल के पद पर रहते हेलीकॉप्टर क्रैश में गई थी जनरल रावत की जान

यहां पर ये भी बताना उल्लेखनीय है कि पूर्व सीडीएस जनरल रावत जब सेना प्रमुख थे यानी 2016 से 2019 तक, उस दौरान कई दशक बाद भारतीय सेना ने सीमा पर चीन की सेना की ‘सलामी-स्लाइसिंग’ पर रोक लगाई थी. जैसा शुरु में बताया था, वो डोकलाम विवाद के दौरान हुआ था. 

वर्ष 2020 में जब जनरल रावत सीडीएस के पद पर थे, तब गलवान घाटी की झड़प के दौरान भी भारतीय सेना ने चीनी सेना को घेर लिया था. उसके बाद से चीनी सेना ने 3488 किलोमीटर लंबी एलएसी, लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर घुसपैठ की कोशिश नहीं की. गलवान घाटी की झड़प में भी भारत को अपनी पूरी एक स्ट्राइक कोर को एलएसी पर तैनात करना पड़ा था. 

इस बीच दिसंबर 2021 में जनरल रावत की हेलीकॉप्टर क्रैश में मौत हो गई थी. उस वक्त, जनरल रावत चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद पर थे. लेकिन जनरल रावत की मौत के बाद भी सेना ने आईबीजी प्लान को जिंदा रखा था और हाल में रिटायर हुए थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने आईबीजी का सपना साकार कर दिया.

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