Breaking News Geopolitics Indian-Subcontinent

बालेन भी ओली की कॉपी, नेपाल को सीखना पड़ेगा इतिहास-भूगोल

लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरने वाली मानसरोवर तीर्थयात्रा मार्ग पर आपत्ति जताने वाले नेपाल को भारत ने सिखा दिया है इतिहास और भूगोल. मानसरोवर यात्रा के मार्ग को अपना बता कर नेपाल ने अड़चन डालने की कोशिश की है. लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने सीधे-सीधे अपना विरोध पत्र भेजकर काठमांडू की नई बालेन शाह सरकार पर करारा जवाब भेज दिया है.

भारत ने कहा है नेपाल का दावा न्यायसंगत नहीं है, लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक प्रमुख मार्ग रहा है और इस मार्ग से यात्रा दशकों से जारी है.

दरअसल नेपाल के विदेश मंत्रालय ने जून-अगस्त 2026 में शुरु होने वाली मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताई है. नेपाल का कहना है कि हिमालय का लिपुलेख दर्रा नेपाली भूमि पर है और बिना उनकी मर्जी के जमीन का इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा.

मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताई आपत्ति

भारत के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की है कि तिब्बत में कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की पवित्र तीर्थयात्रा, 2026 कैलाश मानसरोवर यात्रा, चीन के सहयोग से जून से अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी.

कुल 1,000 तीर्थयात्री, 50-50 के समूहों में यात्रा करते हुए, दो मार्गों का उपयोग करेंगे: एक मार्ग सिक्किम में नाथू ला दर्रा होगा, तो दूसरा मार्ग उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे का होगा.

मानसरोवर यात्रा ऑनलाइन पंजीकरण भी शुरू हो चुका है. इस यात्रा की अंतिम तिथि 19 मई है.

लेकिन नेपाली विदेश मंत्रालय ने लिपुलेख दर्रे को अपना बताते हुए पुराना विवाद फिर से उठाने की कोशिश की है. नेपाल के विदेश मंत्रालय ने लिपुलेख दर्रे से कैलाश मानसरोवर यात्रा कराने की भारत और चीन की योजना पर औपचारिक रूप से आपत्ति जताई है.

नेपाल का कहना है कि हिमालय का यह ऊंचाई वाला दर्रा नेपाली भूमि पर स्थित है और काठमांडू की सहमति के बिना किसी भी पड़ोसी देश को इसका इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है. 

नेपाल के दावे पर भारत ने नेपाल को भेजा प्रोटेस्ट नोट

नेपाल के बयान पर भारत अपना विरोध पत्र भेजा है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नेपाल पर पलटवार करते हुए कहा, कि “क्षेत्रीय दावों के संबंध में, भारत का निरंतर यही मानना रहा है कि ऐसे दावे न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं. क्षेत्रीय दावों का इस प्रकार का एकतरफा बनावटी विस्तार अस्वीकार्य है.”

रणधीर जायलवाल ने कहा, “लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक प्रमुख मार्ग रहा है और इस मार्ग से यात्रा दशकों से जारी है, इस बारे में भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है.”

हालांकि पड़ोसियों से अच्छे संबंधों को लेकर हमेशा से प्राथमिकता देने के कारण भारत ने इस मुद्दे पर संवाद पर भी जोर दिया. रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत के लिए तत्पर है,  जिसमें संवाद और कूटनीति के माध्यम से सहमत लंबित सीमा मुद्दों का समाधान भी शामिल है. ”

रोटी-बेटी का रिश्ता लेकिन लिपुलेख-कालापानी पर क्यों है विवाद, समझिए

भारत और नेपाल के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है. दोनों देश पारंपरिक मित्र हैं. नेपाल की अर्थव्यवस्था, बहुत हद तक भारत पर निर्भर है. भारत आज, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है (करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी के साथ). फ्यूल से लेकर अनाज, दवाइयां और खाने-पीने के जरूरी सामान से लेकर समुद्री-कार्गो के लिए नेपाल, भारत पर निर्भर है.

लेकिन पिछले कुछ वर्ष में जब नेपाल की सत्ता पूर्व पीएम के पी ओली के हाथों आई, तो भारत संग रिश्तों में दरार शुरु हो गई. के पी ओली को चीन का करीबी माना जाता रहा है और चीन के उकसावे के कारण ऐसे कई फैसले लिए जिससे भारत के संबंधों पर असर पड़ा. ओली ने ऐसे कई कदम उठाए जो भारत विरोधी थे.

उदाहरण के दौर पर ओली के पीएम रहते हुए नेपाल ने नक्शा जारी किया, जिसमें भारत के लिपुलेख को नेपाल का बताया गया. काठमांडू ने अपनी नई करेंसी नोट पर नेपाल का जो नया नक्शा दिखाया उसमें विवादित कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाली सीमा में दिखाया, जबकि उत्तराखंड से सटे इन इलाकों पर नेपाल का भारत से लंबा विवाद रहा है. ये इलाका भारत, नेपाल और चीन सीमा के ट्राइ-जंक्शन पर है.

अगर विवादित कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के पूरे क्षेत्रफल को देखें तो पाएंगे कि ये पिथौरागढ़ जिले का 370 वर्ग किलोमीटर का इलाका है. लिपुलेख पास से ही भारत से तिब्बत (चीन) में दाखिल होकर हिंदुओं के पवित्र स्थल कैलाश मानसरोवर का मार्ग जाता है.

चीन की शह पर ओली सरकार के दौरान नेपाल ने लिपुलेख पास और कालापानी इलाके को अपना बताना शुरू कर दिया है. जबकि हकीकत ये है कि कालापानी इलाके में रहने वाले लोग भारतीय मूल के हैं और भारत के चुनाव में वोट देते हैं और टैक्स तक देते हैं.

कालापानी की विवाद की जड़ में है अंग्रेजों के वक्त हुई सुगौली संधि (1816). संधि के तहत, नेपाल ने अपनी पश्चिमी इलाकों को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिए थे. संधि के मुताबिक, भारत और नेपाल की सीमा वहां से शुरू होती है जहां से कालापानी नदी निकलती है. इस नदी के स्रोत को लेकर ही भारत और नेपाल में दरअसल, असल विवाद है.

1879 में सर्वे जनरल ऑफ इंडिया के मैप तक में कालापानी को भारत का क्षेत्र दिखाया गया था. 1924 के नए नक्शे में कालापानी और लिम्पियाधुरा, भारत के अभिन्न हिस्से थे.

1947 में अंग्रेजों के भारत छोड़ने और आजादी के 70 साल तक नेपाल ने कभी भी कालापानी विवाद का जिक्र नहीं किया था. वर्ष 2017 में भूटान ट्राई-जंक्शन को लेकर जब भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद हुआ तब, चीन ने पहली बार वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दूसरे विवादित ट्राई-जंक्शन का जिक्र किया. चीन का सीधा इशारा, कालापानी और लिपुलेख ट्राई-जंक्शन की तरफ था. क्योंकि ये भारत, चीन और नेपाल का ट्राइ-जंक्शन है.

साल 2020 से लिपुलेख-कालापानी पर बदला नेपाल का सुर

नेपाल ने पहली बार कालापानी का विवाद उठाया वर्ष 2020 में. उस वक्त, गलवान घाटी की झड़प के बाद, भारत और चीन के बीच जबरदस्त तनातनी चल रही थी. इसी दौरान, चीन ने लिपुलेख से सटे इलाकों में पीएलए-आर्मी की एक बटालियन को तैनात कर नई चौकी (पोस्ट 69310) बनाई थी. साथ ही, उत्तराखंड से सटी एयर-स्पेस का की बार उल्लंघन किया था.

लिम्पियाधुरा के दूसरी तरफ चीन ने 150 लाइट कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड को तैनात किया, तो तिब्बत के नगरी प्रिफेक्चर में 361 बॉर्डर डिफेंस रेजीमेंट का नया गैरिसन खड़ा कर दिया.

चीन की हरकतों को देखते हुए बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) ने आनन-फानन में पिथौरागढ़ से तवाघाट और घाटयाबगढ़ तक 80 किलोमीटर लंबी एक सड़क बनाई थी. बेहद दुर्गम इलाकों से गुजरती हुई ये सड़क 6000 फीट से शुरू होकर 17 हजार फीट से भी ज्यादा ऊंचाई तक जाती है. किसी भी विपरीत परिस्थिति में ये इलाका, भारत के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता था. इस सड़क के बनने के बाद चीन ने नेपाल के कान भर दिए. और नेपाल ने इन इलाकों को अपना बताना शुरु कर दिया.

ओली के नक्शेकदम पर नए पीएम बालेन शाह

के पी ओली को पिछले साल जनरेशन जी (जेन ज़ी) के उग्र प्रदर्शन के बाद सत्ता छोड़कर जान बचाकर भागना पड़ा. उसके बाद नेपाल में चुनाव के बाद बालेन शाह नए प्रधानमंत्री बनाए गए हैं.

पेशे से रैपर बालेन शाह काठमांडू मेयर रह चुके हैं. युवाओं में बेहद प्रचलित चेहरा हैं. माना जा रहा था कि बालेन शाह, भारत के साथ अच्छे संबंधों पर जोर देंगे, लेकिन जिस तरह से मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने अड़ंगा लगाया है, उससे ऐसा ही लग रहा है कि शाह भी ओली के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं.

इससे पहले भी जून 2023 में काठमांडू के मेयर रहते हुए बालेन शाह ने हिन्दी फ़िल्म आदिपुरुष पर पाबंदी लगा दी थी. बालेन को इस बात पर आपत्ति थी कि फिल्म में देवी सीता को भारत का बताया गया था.

editor
India's premier platform for defence, security, conflict, strategic affairs and geopolitics.