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जेएफके फाइल्स: CIA का भारत में सीक्रेट बेस

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी (1961-63) की हत्या से जुड़े 80 हजार दस्तावेजों को ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक कर दिए हैं. इन पेपर्स में कैनेडी की हत्या की साजिश तो सामने आ ही गई है, साथ ही अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के राज़ भी बाहर आ गए हैं. एक ऐसा ही राज़ भारत से जुड़ा. राज़ ये कि 1963 में सीआईए के सीक्रेट बेस भारत में भी थे. जबकि आजादी के बाद से भारत के अमेरिका से कोई खास संबंध नहीं थे.

जेएफके फाइल्स के मुताबिक, कैनेडी की हत्या के वक्त, सीआईए के दुनियाभर में दर्जनों ‘फील्ड’ ऑफिस थे. इनमें से दो, नई दिल्ली और कोलकाता (उस वक्त कलकत्ता) में थे. टीएफए ने अपनी जांच में हालांकि, पता लगाया कि ये महज ऑफिस थे. असल में सीआईए सीक्रेट बेस कहीं और था और इसके बनाए जाने के पीछे एक खास कारण था.

’62 में चीन के हाथों हार के बाद भारत ने पकड़ा था सीआईए का हाथ

जॉन एफ कैनेडी की हत्या (22 नवम्बर 1963) से ठीक एक साल पहले भारत को चीन के हाथों हिमालय में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था और अक्साई चिन को भी गंवाना पड़ा था. 1962 के युद्ध से पहले तक भारत, दुनियाभर में गुटनिरपेक्ष नीति के लिए जाना जाता था. ‘कोल्ड वॉर’ के दोनों धड़ों से अलग, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (15 अगस्त 1947-27 मई 1964) ने मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ मिलकर थर्ड वर्ल्ड देशों का अलग गुटनिरपेक्ष समूह खड़ा किया था.

गुटनिरपेक्ष नीति का नतीजा ये हुआ कि जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो, कोई भी महाशक्ति (अमेरिका और रूस इत्यादि) देशों में से कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया. भारत की मदद न करने का एक कारण ये भी था कि अमेरिका और रूस, दोनों ही इस दौरान क्यूबा मिसाइल संकट में उलझे हुए थे.

चीन की विस्तारवादी नीति से हालांकि, अमेरिका विचलित हो गया और भारत की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया. नेहरू जी, शुरुआत में अमेरिका से मदद लेने में हिचकिचा रहे थे. इस दौरान हालांकि, ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने नेहरू को चीन के खिलाफ अमेरिका से मदद लेने के लिए तैयार कर लिया. माना जाता है कि पेशे से पायलट बीजू, नेहरू के डिफेंस एडवाइजर के तौर पर भी काम करते थे.

ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने सीआईए बेस स्थापित करने में निभाई थी अहम भूमिका

नेहरू और बीजू पटनायक की जुगलबंदी के बारे में भारत की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (आरएंडएडब्लू यानी रॉ) के पूर्व अधिकारी आर के यादव ने अपनी किताब, ‘न्यूक्लियर बम इन गंगा’ में विस्तृत जानकारी दी है.

आर के यादव लिखते हैं कि बाकी अमेरिकी राष्ट्रपतियों से इतर, कैनेडी भारत के अहम मित्र थे और 1962 के युद्ध में चीन के खिलाफ भारत की खासी मदद की थी. चीन ने जैसे ही भारत पर आक्रमण किया, बीजू पटनायक की मदद से सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने ओडिशा के कटक के बेहद करीब चारबाटिया में एक गुप्त एयरबेस तैयार किया गया था. इस बेस पर तिब्बत के विद्रोहियों को गोरिल्ला युद्ध के लिए ट्रेनिंग दी जाती थी. इस संगठन को शुरुआत में एस्टेब्लिशमेंट 22 (टूटू) कहा जाता था. बाद में इसे स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) का नाम दिया गया और ये सीक्रेट बेस उत्तराखंड शिफ्ट कर दिया गया था.

कैनेडी की हत्या और ’65 युद्ध के बाद अमेरिका से हो गए थे संबंध-विच्छेद

कैनेडी की 1963 में हत्या और फिर 1965 के पाकिस्तान युद्ध के चलते, भारत और अमेरिका के संबंधों में दरार आ गई. युद्ध के बाद भारत, रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के ज्यादा नजदीक चला गया. इसके बाद सीआईए के भारत की गुप्तचर एजेंसियों से ज्यादा संबंध नहीं पाए गए.

बाद में आरएंडएडब्लू ने अपनी अलग एविएशन विंग एआरसी (एविएशन रिसर्च सेंटर) खड़ी कर ली और एसएफएफ आज भी भारत के सुरक्षा-तंत्र का अहम हिस्सा है. वर्ष 2020 में चीन के खिलाफ गलवान घाटी की लड़ाई के दौरान भारतीय सेना ने एसएफएफ कमांडो का इस्तेमाल किया था. भारत सरकार ने हालांकि, आज तक एसएफएफ या एआरसी के बारे में कभी कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की है.