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एंटी सबमरीन वारफेयर के लिए Wave Glider, स्वदेशी स्टार्टअप ने मिलाया अमेरिकी कंपनी से हाथ

एंटी-सबमरीन वारफेयर के लिए भारत के सागर डिफेंस इंजीनियरिंग (स्टार्टअप) ने अमेरिका की लिक्विड-रोबोटिक्स के साथ ‘वेव ग्लाइडर’ प्लेटफॉर्म बनाने के लिए करार किया है. बेहद किफायती और बिना क्रू के ये ऑटोनॉमस सरफेस वैसल (एएसवी) एक साल तक समंदर में रहकर दुश्मन की पनडुब्बियों और जहाज का डाटा इकठ्ठा कर सकते हैं.

हिंद महासागर में चीन की पनडुब्बियों की बढ़ती गतिविधियों पर इस तरह के वेव-ग्लाइडर पैनी नजर रख सकते हैं.

सागर-डिफेंस और लिक्विड रोबोटिक्स के बीच हुए समझौते से मेरीटाइम सुरक्षा मजबूत होने और अंडरसी डोमेन अवेयरनेस बढ़ सकती है. बोइंग कंपनी द्वारा जारी बयान के मुताबिक, सागर डिफेंस के साथ लिक्विड रोबोटिक्स, एंटी-सबमरीन वारफेयर प्लेटफॉर्म एएसवी के निर्माण से लेकर सिस्टम इंटीग्रेशन और टेस्टिंग सहित मेंटनेंस, रिपेयर और ओवरहालिंग (एमआरओ) फैसिलिटी स्थापित करने जा रही है.

उल्लेखनीय है कि लिक्विड रोबोटिक्स, अमेरिकी ग्लोबल एविएशन कंपनी बोइंग की एक सबसिडरी कंपनी है.

करार के वक्त भारत और अमेरिकी की रक्षा-सुरक्षा से जुड़े अधिकारी रहे मौजूद

करार पर हस्ताक्षर के वक्त सागर-डिफेंस, लिक्विड रोबोटिक्स और बोइंग के सीनियर एग्ज्यूकेटिव के साथ-साथ अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (एनएसएसी) के सीनियर डायरेक्टर (साउथ एंड सेंट्रल एशिया) रिकी गिल और भारत के रक्षा मंत्रालय के डीआईओ के सीओओ विवेक विरमानी भी मौजूद थे.

सागर डिफेंस और लिक्विड रोबोटिक्स के बीच इस साझेदारी को भारत और अमेरिका के डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉपरेशन और अंडरसी डोमेन अवेयरनेस के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है. पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाशिंगटन डीसी की यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ जिस साझा बयान को जारी किया गया था, उसमें क्रिटिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में साझेदारी का खास तौर से जिक्र किया गया था.

क्या होता है वेव ग्लाइडर

वेव-ग्लाइडर एक बेहद छोटा ओटोनोमस और बिना क्रू वाला सरफेस वैसल होता है, जो समंदर की लहरों और सोलर एनर्जी से संचालित होता है. ये स्वतंत्र तौर से या फिर किसी जंगी बेड़े का हिस्सा बनकर ओपरेट कर सकता है.

वेव-ग्लाइडर के दो हिस्से होते हैं. एक फ्लोट होता है जो समंदर की सतह पर चलता है और दूसरा एक ग्लाइडर, जो समंदर के नीचे होता है. ये दोनों हिस्से, एक कोर्ड के जरिए जुड़े होते हैं.  

फ्लोट में ही सेंसर और सॉफ्टवेयर होता है जो समंदर की सतह और पानी के नीचे का सारा डाटा इकठ्ठा करता है.

वेव-ग्लाइडर का इस्तेमाल शुरुआत में तेल और गैस इंडस्ट्री इस्तेमाल करती थी ताकि ऑफशोर प्लेटफॉर्म को मॉनिटर किया जा सके और समंदर के नीचे वेल हेड्स के साथ कम्युनिकेशन किया जा सके. लेकिन अब इस वेब ग्लाइडर का इस्तेमाल समंदर की निगरानी और एएसडब्लू के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है.

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