By Nalini Tewari
होर्मुज पर अहंकार दिखाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टेक दिए हैं ईरान के सामने घुटने. ईरान को नक्शे से मिटा देने का दंभ भरने वाले ट्रंप ने एक बार फिर से अपने बयान ने ले ली है पलटी.
क्या अमेरिकी सेना जल्द छोड़ देगी ईरान. क्या अमेरिका, इजरायल को अकेला छोड़ने वाला है. 32 दिनों से जंग की आग में जूझ रहे मिडिल ईस्ट में अब शांति आने वाली है या अकेले अपने सहयोगी अमेरिका के बिना है इजरायल, ईरान को देता रहेगा चुनौती. ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने कह दिया है कि समझौता हो या न हो, होर्मुज खुले या न खुले, अमेरिकी सेना ने अपना टारगेट हासिल कर लिया है.
होर्मुज खुले ना खुले, हमसे मतलब नहीं, हमने ईरान को बर्बाद कर दिया: ट्रंप
ट्रंप देश को संबोधित करने वाले हैं और माना जा रहा है कि ट्रंप इस संबोधन में अमेरिकी सैनिकों की ईरान से वापसी को घोषणा कर देंगे. 28 फरवरी से शुरू हुआ ईरान-अमेरिका युद्ध निर्णायक मोड़ पर है. इजरायल के साथ जंग में कूदे अमेरिका ने ये नहीं सोचा था कि ईरान एक महीने से भी ज्यादा वक्त तक उनके सामने ना सिर्फ टिका रहेगा, बल्कि नुकसान भी पहुंचाएगा.
भारतीय समयानुसार 2 अप्रैल की सुबह राष्ट्र को संबोधित करेंगे, जिसमें ईरान के साथ जारी युद्ध को खत्म करने से जुड़े ऐलान की उम्मीद की जा रही है. अभी तक ईरान के खिलाफ ग्राउंड ऑपरेशन शुरु करने की बात कहने वाले ट्रंप ये कहने लगे हैं कि अमेरिका ने अपने सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए हैं और होर्मुज स्ट्रेट खुला रहे या बंद, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.
ट्रंप ने अपने ताजा बयान में कहा, “अमेरिका दो से तीन सप्ताह के अंदर ईरान पर अपने सैन्य हमले रोक देगा. वॉशिंगटन अब ईरान के साथ युद्ध में ज्यादा समय तक शामिल नहीं रहेगा. इस संघर्ष को खत्म करने के लिए तेहरान को कोई समझौता करना जरूरी नहीं है.”
जब ट्रंप से सवाल किया गया कि क्या ईरान के साथ जंग खत्म करने के लिए कोई जरूरी शर्त है तो ट्रंप ने कहा कि “ऐसा नहीं है. ईरान को कोई समझौता करना जरूरी नहीं है.”
ईरान युद्ध से पीछे हट जाएगा अमेरिका !
अमेरिका अब अपने कदम पीछे खींचने जा रहा है. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान जंग खत्म करने का इशारा कर दिया है. लेकिन इस युद्ध से अमेरिका को हासिल क्या हुआ. सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई, अली लारीजानी, और सभी सैन्य शीर्ष के मारे जाने के बाद भी ईरान ने अमेरिका-इजरायल को नाको तले चने चबवा दिए. अमेरिका अपनी पसंद का सुप्रीम लीड़र बनाना चाहता था, वो हुआ नहीं. ईरान की कट्टरपंथी सरकार को गिराना चाहता था, वो हुआ नहीं.
न्यूक्लियर हथियारों के खात्मे के नाम पर ईरान पर हमले किए गए, लेकिन अमेरिका के अधिकारी ही दावा कर रहे हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियारों की पहुंच नहीं. अमेरिका की टॉमहॉक मिसाइल से 150 से ज्यादा स्कूली बच्चे मार दिए गए, लोगों के घर तबाह हो गए. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कमी से देशों को जूझना पड़ा. खाड़ी देशों को भयंकर नुकसान हुआ.
होर्मुज पर कब्जे से क्यों पलटे ट्रंप ?
होर्मुज से बोरिया बिस्तर बांधना ट्रंप की मजबूरी है. ईरान लगातार खाड़ी देशों पर हमले कर रहा है. जिसके कारण खाड़ी देश भी अमेरिका पर भड़के हुए हैं. वहीं अमेरिकी कंपनियों पर भी ईरान ने अटैक करने की घोषणा कर दी है.
ट्रंप चाहते थे कि होर्मुज पर यूरोप के देश उनका साथ देंगे, लेकिन ब्रिटेन हो या फ्रांस, इटली, जर्मनी हर किसी ने युद्ध में कूदने से मना कर दिया. उल्टा फ्रांस और इटली जैसे देशों ने तो अमेरिकी सैन्य विमानों तो एयरस्पेस तक नहीं दिया.
ट्रंप ने अपने बयान में कहा, होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की जिम्मेदारी उन देशों की होनी चाहिए, जो इस पर निर्भर हैं, न कि अमेरिका की. हमारे लिए ऐसा करने का कोई कारण नहीं है.
अमेरिका को लगा था कि वो ईरान पर हमला करके वेनेजुएला जैसी जीत हासिल कर लेंगे. अपनी मर्जी का सुप्रीम लीडर बनाएंगे. एक अटैक करके खामेनेई की हत्या कर अमेरिका को ये लक्ष्य हासिल हो जाएगा. मगर इसके उलट हुआ. डोनाल्ड ट्रंप की सोच से ज्यादा ईरान ने पलटवार किया. ईरान ने खाड़ी देशों पर हमला करना शुरु कर दिया, जो शायद किसी ने भी नहीं सोचा था. अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद ईरान घायल शेर की तरह जंग में उतर गया और ऐलान कर दिया कि किसी के मारे जाने के बाद भी ईरान की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा.
मोसाद और सीआईए के जासूसों की कोशिश थी कि इस हमले के बीच ईरान में प्रदर्शन किए जाएं. लेकिन हुआ उल्टा, ईरान की जनता एकजुट हो गई. ना तो कोई प्रदर्शन हुआ और ना ही अमेरिका के पक्ष में कोई आवाज उठी. वहीं अमेरिका के अंदर ट्रंप के खिलाफ प्रदर्शन किया जाने लगा. सड़कों पर हजारों लोग उतर गए. युद्ध के बीच एक सर्वे में ट्रंप की लोकप्रियता घटकर 15 प्रतिशत पहुंच गई.
ट्रंप ना तो रिजीम बदल पाए और इजरायल के अलावा किसी दूसरे देश को युद्ध में उतार पाए. ईरान के सामने अमेरिका की स्थिति मरता क्या न करता वाली हो गई. माना जा रहा है कि इसलिए ही चुपचाप ट्रंप इस युद्ध से बाहर निकलना चाह रहे हैं. ताकि शांतिदूत जैसी बची कुची इज्जत बनी रहे.

