रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर भारत ने ऐतिहासिक सफलता हासिल की है. भारत ने ड्रोन से लॉन्च होने वाली मिसाइल का सफल परीक्षण किया है. अडानी डिफेंस और भारत डायनमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) इस ड्रोन का प्रोडक्शन करेगी.
आंध्र प्रदेश के कुरनूल में हुए इस परीक्षण ने भारतीय सेना की मारक क्षमता को और घातक बना दिया है. इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह आसमान से न सिर्फ जमीन पर मौजूद दुश्मन के ठिकानों को ध्वस्त कर सकती है बल्कि हवा में खतरों को नेस्तानाबूत करने में पूरी तरह सक्षम है.
आने वाले समय में ड्रोन आधारित युद्ध और तेजी से बढ़ेगा, ऐसे में यूएलपीजीएम-वी 3 जैसी हल्की, सस्ती और सटीक मिसाइल भारतीय सेना की ताकत को नई बढ़त दे सकती है.
अचूक निशाना, सेना की ताकत को मिली धार
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानि डीआरडीओ ने आंध्र प्रदेश के कुरनूल के पास डीआरजीओ परीक्षण रेंज में एयर-टू-ग्राउंड और एयर-टू-एयर मोड में अनमैन्ड एरियल व्हीकल लॉन्च्ड प्रिसिजन गाइडेड मिसाइल (यूएलपीजीएम)-वी 3 के अंतिम डिलीवरेबल कॉन्फ़िगरेशन विकास परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है. ये परीक्षण यूएलपीजीएम हथियार प्रणाली को कमांड और कंट्रोल करने के लिए एकीकृत ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम (जीसीएस) का उपयोग करके किए गए. (https://x.com/DRDO_India/status/2056774339236913409?s=20)
परीक्षण के दौरान यूएलपीजीएम वी-3 ने एयर-टू-ग्राउंड और एयर-टू-एयर दोनों मोड में अपनी सटीकता को साबित किया. अत्याधुनिक सेंसर और सीकर तकनीक से लैस यह मिसाइल दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों, अभेद्य टैंक और बंकर्स को तो नष्ट करेगी ही, साथ ही कम ऊंचाई पर उड़ रहे दुश्मन के ड्रोन, टोही विमानों और लड़ाकू हेलीकॉप्टरों को भी हवा में मार गिराने में सक्षम है.
यूएलपीजीएम की खासियत जानिए
यूएलपीजीएम का पूरा नाम ‘अनमैन्ड एरियल व्हीकल लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल’ है. यह हल्की, स्मार्ट और बेहद सटीक है. इसे छोटे ड्रोन, बड़े यूएवी और अटैक हेलीकॉप्टर से भी लॉन्च किया जा सकता है.
यह मिसाइल ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक पर काम करती है. आसन शब्दों में समझे तो लॉन्च के बाद ऑपरेटर को इसे लगातार कंट्रोल करने की जरूरत नहीं होती. मिसाइल खुद अपने लक्ष्य को पहचानकर हमला करती है.
ये एयर-टू-एयर अचैक कर सकती है, अब तक ऐसी हल्की मिसाइलें ज्यादातर जमीन पर मौजूद लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल होती थीं. लेकिन अब यह मिसाइल हवा में उड़ रहे दुश्मन ड्रोन और हेलीकॉप्टरों को भी मार सकती है.
मिसाइल का वजन करीब 12.5 किलोग्राम है. इसकी रेंज दिन में लगभग 4 से 10 किलोमीटर तक है. रात में भी यह कई किलोमीटर दूर मौजूद लक्ष्य को निशाना बना सकती है.
इसमें हाई-डेफिनिशन डुअल चैनल सीकर लगाया है. इसमें इमेजिंग इंफ्रारेड और आरएफ तकनीक का इस्तेमाल हुआ है. इससे मिसाइल दिन और रात दोनों समय दुश्मन को पहचान सकती है.
इस मिसाइल में टू-वे डेटा लिंक तकनीक भी दी गई है. यानी लॉन्च के बाद भी ऑपरेटर मिसाइल को नई जानकारी भेज सकता है. जरूरत पड़ने पर मिसाइल का टारगेट बदला भी जा सकता है.
मिसाइल में अलग-अलग तरह के वारहेड लगाए जा सकते हैं. यह टैंक, बंकर और सैनिकों जैसे अलग-अलग लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है.
दुश्मनों द्वारा कम्युनिकेशन सिस्टम जाम करने की स्थिति में भी यह मिसाइल अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है.
आत्मनिर्भरता की ओर देश का एक और कदम
दुनियाभर में फैली अनिश्चितताओं और बढ़े सैन्य संघर्षों के बीच ये मिसाइल भारत की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगी. जिस तरह से युद्धों का स्वरूप बदल रहा है, चाहे वो रूस-यूक्रेन युद्ध हो या फिर हाल में चल रहा अमेरिका-ईरान का युद्ध, ड्रोन टेक्नोलॉजी ने अपना लोहा मनवाया है. ऐसे में में ड्रोन-लॉन्च मिसाइल तकनीक का भारत में ही विकसित होना एक गेम-चेंजर है. क्योंकि मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलते हुए भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई ये मिसाइल पूरी तरह से स्वदेशी है.भारतीय सशस्त्र बलों को विदेशी कंपनियों और महंगे आयात पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस शानदार कामयाबी पर डीआरडीओ के वैज्ञानिकों और डिफेंस इंडस्ट्री को बधाई दी है. राजनाथ सिंह ने इस परीक्षण को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी मील का पत्थर बताया है.
डीआरडीओ ने इस उपलब्धि पर क्या कहा
डीआरडीओ के चेयरमैन समीर वी कामत ने इसे भारतीय रक्षा तकनीक की बड़ी उपलब्धि कहा. वी कामत ने बताया, “इस परियोजना में कई सरकारी और निजी कंपनियों ने मिलकर काम किया. भारत डायनामिक्स लिमिटेड, अडानी डिफेंस सिस्टम एंड टेक्नोलॉजी लिमिटेड , न्यू स्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी जैसी जैसी कंपनियां भी इसमें शामिल रहीं.” ()

