भारतीय नौसेना के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर रफाल लड़ाकू विमान के मरीन वर्जन ने पहली बार लैंडिंग की है. इनदिनों फ्रांस से रफाल (एम) लड़ाकू विमान ट्रायल के लिए गोवा आए हुए हैं. ऐसे में भारतीय नौसेना को डिलीवरी शुरु करने से पहले, फ्रांस की दासो कंपनी ने रफाल (एम) के फाइनल ऑपरेशनल ट्रायल शुरु कर दिए हैं.
पिछले साल यानी अप्रैल 2025 में भारत और फ्रांस के बीच रफाल फाइटर जेट के 26 मरीन वर्जन का सौदा किया था. इन रफाल को रफाल-एम के नाम से जाना जाता है. इस सौदे की कुल कीमत करीब 63 हजार करोड है. विक्रांत पर ट्रायल के बाद, रफाल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दासो, इन रफाल-एम का प्रोडक्शन शुरु कर देगी. क्योंकि मिड-2028 तक दासो को रफाल-एम की डिलीवरी शुरु करनी है.
भारत के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, वर्ष 2030 यानी डील पर हस्ताक्षर होने के अगले पांच सालों में सभी 26 कैरियर बॉर्न रफाल (एम) भारतीय नौसेना को मिल जाएंगे. नौसेना के लिए जो 26 रफाल (एम) खरीदे जा रहे हैं, उनमें 22 सिंगल सिटर फाइटर जेट होंगे और चार ट्विन-सीटर यानी ट्रेनिंग के लिए होंगे.
36 रफाल की तरह मरीन वर्जन का भी हुआ है इंटरगर्वमेंटल डील एग्रीमेंट
वायुसेना के 36 रफाल लड़ाकू विमानों की तरह ही रफाल (एम) भी ‘इंटरगर्वमेंटल डील’ (आईजीआई) यानी दोनों देशों की सरकार के बीच सीधे समझौते के तहत ही खरीदे जा रहे हैं. स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर तैनात करने के लिए इन रफाल-एम लड़ाकू विमानों को खरीदा जा रहा है. सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में केरल के कोच्चि नेवल बेस पर विक्रांत को नौसेना के जंगी बेड़े में शामिल कर लिया गया था. लेकिन उस पर तैनात करने के लिए भारत के पास फिलहाल कोई मेरीटाइम फाइटर जेट नहीं है.
नौसेना के पास जो फिलहाल लड़ाकू विमान हैं, वे हैं रूस के मिग-29के जो अब पुराने एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य पर तैनात रहते हैं. जरुरत पड़ने पर इन मिग-29के को विक्रांत पर तैनात करना पड़ता है.
रफाल (एम) लैस होगा अस्त्रा और ब्रह्मोस मिसाइल से
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, आत्मनिर्भर भारत के तहत रफाल-एम में स्वदेशी हथियारों का इंटीग्रेशन भी किया जाएगा. इन हथियारों में अस्त्रा और ब्रह्मोस (एंटी-शिप) मिसाइल शामिल हैं. अभी जो भारतीय वायुसेना के पास जो 36 रफाल लड़ाकू विमान हैं, उनमें सभी मिसाइलें यूरोप की बड़ी कंपनी एमबीडीए ने सप्लाई की हैं.रफाल-एम को भारत में बनी अस्त्रा, जो लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल होगी. इसके अलावा, दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइलों में शुमार ब्रह्मोस से भी रफाल-मरीन को लैस किया जा रहा है.
ये ट्रायल इसलिए जरूरी है, क्योंकि फ्रांसीसी नौसेना के जो एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, वे कैटोबार यानी कैटापुल्ट तकनीक इस्तेमाल करते हैं. यानी एयरक्राफ्ट कैरियर के डेक से फाइटर जेट को कैटापुलट की तरह लॉन्च कर टैकऑफ कराया जाता है. भारतीय नौसेना, लेकिन रूसी तकनीक से ज्यादा प्रभावित रहती है. इसलिए ,स्टोबार यानी शॉर्ट टेक ऑफ या जिसे हम आम भाषा में स्कीइंग तकनीक कहते हैं, उसका इस्तेमाल करते हैं. आईएनएस विक्रमादित्य की तरह स्वदेशी विमानवाहक युद्धपोत विक्रांत भी स्टोबार तकनीक इस्तेमाल करता है.
हिंद महासागर में बन रही ऐसी परिस्थितियां, इंडियन नेवी की बढ़ा रही टेंशन
भारतीय नौसेना को रफाल-एम की इसलिए थोड़ा जल्दी दरकार है, क्योंकि हिंद महासागर में कुछ ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं, जो भारत के टेंशन बढ़ा रही हैं. इसी महीने के शुरुआत में पाकिस्तानी नौसेना ने चीन से ली अपनी पहली हैंगोर क्लास पनडुब्बी को अरब सागर में तैनात किया. पाकिस्तानी नौसेना ने इस हैंगोर पनडुब्बी से एक मिसाइल को दागकर दुनिया को पनडु्ब्बी की तैनाती की जानकारी दी थी. अरूणाचल प्रदेश से सटी एलएसी पर चीन की पीएलए-आर्मी एक बार फिर घुसपैठ की कोशिश कर रही है. लद्दाख से सटे काराकोरम में चीन और पाकिस्तान की सेनाओं ने कुछ दिन पहले अपना पहला पहला साझा युद्धाभ्यास शुरु किया है. ऐसे में भारत को अपने दोनों, एयरक्राफ्ट कैरियर—यानी विक्रांत और विक्रमादित्य को पूरी तरह ऑपरेशनली तैयार कर समंदर में उतारना है.


Leave feedback about this