पड़ोसी देश नेपाल में राजतंत्र की वापसी को लेकर राजधानी काठमांडू में जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन चल रहा है. सड़कों पर सेना को उतारना पड़ा है. निरंकुश शासन, मंत्रियों से लेकर संतरियों का भ्रष्टाचार, घोटाले और आर्थिक विकास में पिछड़ने जैसे मुद्दों को लेकर नेपाल की जनता में जबरदस्त रोष है. इसके साथ ही सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों की भारत से दूरी और चीन की गोद में बैठना भी इस गुस्से का एक बड़ा कारण है.
चीन के साथ नजदीकियां बनाने का ही नतीजा है कि नेपाल ने पिछले पांच साल से उत्तराखंड से सटी सीमा पर विवाद भारत से विवाद शुरू कर दिया है. कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख पास (दर्रे) को नेपाल ने अपने नक्शे में दिखाना शुरु कर दिया है. टीएफए को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक, नेपाल ने अपने स्कूलों की किताबों में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के इन विवादित इलाकों को अपना बता दिया है.
नेपाल ने आठवीं क्लास के पाठ्यक्रम में विवादित इलाकों को दिखाया अपने नक्शे में
नेपाल की लेफ्ट सरकारें अपनी देश के बच्चों को भारत के खिलाफ उकसाने का काम कर रही है. यही वजह है कि नेपाल के स्कूलों में आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में सोशल स्टडीज (सामाजिक अध्ययन) की किताब में पिथौरागढ़ जिले के इन इलाकों को ही अपने नक्शे में दिखा दिया है.
अगर विवादित कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के पूरे क्षेत्रफल को देखें तो पाएंगे कि ये पिथौरागढ़ जिले का 370 वर्ग किलोमीटर का इलाका है. लिपुलेख पास से ही भारत से तिब्बत (चीन) में दाखिल होकर हिंदुओं के पवित्र स्थल कैलाश मानसरोवर का मार्ग जाता है.
चीन की शह पर हालांकि, नेपाल ने लिपुलेख पास और कालापानी इलाके को अपना बताना शुरू कर दिया है. जबकि हकीकत ये है कि कालापानी इलाके में रहने वाले लोग भारतीय मूल के हैं और भारत के चुनाव में वोट देते हैं और टैक्स तक देते हैं.
कैसे हुई कालापानी विवाद की शुरूआत
कालापानी की विवाद की जड़ में है अंग्रेजों के वक्त हुई सुगौली संधि (1816). संधि के तहत, नेपाल ने अपनी पश्चिमी इलाकों को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिए थे. संधि के मुताबिक, भारत और नेपाल की सीमा वहां से शुरू होती है जहां से कालापानी नदी निकलती है. इस नदी के स्रोत को लेकर ही भारत और नेपाल में दरअसल, असल विवाद है.
1879 में सर्वे जनरल ऑफ इंडिया के मैप तक में कालापानी को भारत का क्षेत्र दिखाया गया था. 1924 के नए नक्शे में कालापानी और लिम्पियाधुरा, भारत के अभिन्न हिस्से थे.
1947 में अंग्रेजों के भारत छोड़ने और आजादी के 70 साल तक नेपाल ने कभी भी कालापानी विवाद का जिक्र नहीं किया था. वर्ष 2017 में भूटान ट्राई-जंक्शन को लेकर जब भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद हुआ तब, चीन ने पहली बार वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दूसरे विवादित ट्राई-जंक्शन का जिक्र किया. चीन का सीधा इशारा, कालापानी और लिपूलेख ट्राई-जंक्शन की तरफ था. क्योंकि ये भारत, चीन और नेपाल का ट्राइ-जंक्शन है.
नेपाल ने कब और क्यों उठाया लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का विवाद
नेपाल ने पहली बार कालापानी का विवाद उठाया वर्ष 2020 में. उस वक्त, गलवान घाटी की झड़प के बाद, भारत और चीन के बीच जबरदस्त तनातनी चल रही थी. इसी दौरान, चीन ने लिपूलेख से सटे इलाकों में पीएलए-आर्मी की एक बटालियन को तैनात कर नई चौकी (पोस्ट 69310) बनाई थी. साथ ही, उत्तराखंड से सटी एयर-स्पेस का की बार उल्लंघन किया था.
लिम्पियाधुरा के दूसरी तरफ चीन ने 150 लाइट कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड को तैनात किया, तो तिब्बत के नगरी प्रिफेक्चर में 361 बॉर्डर डिफेंस रेजीमेंट का नया गैरिसन खड़ा कर दिया.
चीन की हरकतों को देखते हुए बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) ने आनन-फानन में पिथौरागढ़ से तवाघाट और घाटयाबगढ़ तक 80 किलोमीटर लंबी एक सड़क बनाई थी. बेहद दुर्गम इलाकों से गुजरती हुई ये सड़क 6000 फीट से शुरू होकर 17 हजार फीट से भी ज्यादा ऊंचाई तक जाती है. किसी भी विपरीत परिस्थिति में ये इलाका, भारत के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता था.
इस सड़क के बनने के बाद चीन ने नेपाल के कान भर दिए. फिर क्या था, नेपाल ने चीन से मंगाए नए करेंसी नोट पर अपने देश का नया नक्शा छाप दिया, जिसमें विवादित कालापानी इत्यादि को अपना क्षेत्र दिखा दिया.
नए करेंसी नोट पर विवादित क्षेत्रों को अपना बताकर नेपाल ने अब अपने स्कूल के पाठ्यक्रम और एजुकेटर गाइड्स तक में पिथौरागढ़ जिले के इन विवादित इलाकों को अपना बता दिया है.
नेपाल की शिक्षा प्रणाली में चीन की जबरदस्त पैठ
कालापानी इत्यादि विवादित इलाकों को नेपाल के पाठ्यक्रम में अपना बताने के पीछे भी चीन ही है. क्योंकि चीन ने छात्रों और युवाओं के एक्सचेंज कार्यक्रमों के जरिए नेपाल की शिक्षा प्रणाली में खासी पैठ बना ली है. सिविल सोसायटी, एनजीओ और वित्तीय मदद के जरिए, चीन ने नेपाल के साथ लगातार डिप्लोमैटिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान करता है.
भारत और नेपाल में है रोटी-बेटी का रिश्ता
जबकि हकीकत ये है कि भारत और नेपाल में रोटी-बेटी का संबंध है. नेपाल की अर्थव्यवस्था, बहुत हद तक भारत पर निर्भर है. भारत आज, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है (करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी के साथ). फ्यूल से लेकर अनाज, दवाइयां और खाने-पीने के जरूरी सामान से लेकर समुद्री-कार्गो के लिए नेपाल, भारत पर निर्भर है.
दूसरी तरफ नेपाल के युवा, बड़ी संख्या में भारत की कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री से लेकर होटल और सिक्योरिटी सेक्टर में कार्यरत हैं.
इसी साल आम बजट (2025) में भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल को 700 करोड़ की ग्रांट दी है.
भारत से इतने करीबी संबंध होने के बावजूद, नेपाल की सरकारों द्वारा भारत की अनदेखी और चीन के इशारों पर नाचना ही नेपाली जनता को एक आंख नहीं सुहा रहा है. यही वजह है कि नेपाली जनता, लोकतंत्र को हटाकर फिर से राजशाही और हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहे है.