जर्मन चांसलर, फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में नया आयाम जुड़ने जा रहा है. क्योंकि दोनों देशों के बीच भारतीय नौसेना के लिए साझा स्टील्थ पनडुब्बी बनाने को लेकर अहम बातचीत हुई है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मर्ज़ से मुलाकात के दौरान, भारत और जर्मनी के बीच साझा रक्षा उद्योग को लेकर अहम घोषणा की.
पीएम मोदी और चांसलर मर्ज के बीच अहमदाबाद में हुई वार्ता के बाद विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि नौसेना के लिए छह (06) पनडुब्बियों के निर्माण पर ‘सकारात्मक चर्चा’ चल रही है और ‘पॉजिटिव आउटकम’ की उम्मीद है.
विदेश सचिव के मुताबिक, इस तरह के सौदों में टेक्निकल, फाइनेंशियल और कमर्शियल चर्चा शामिल रहती हैं, जो फिलहाल चल रही हैं. ये चर्चा पूरी होने के बाद रक्षा मंत्रालय इस पर जानकारी साझा कर सकता है.
नौसेना के प्रोजेक्ट 75 (आई) के तहत बनेंगी 06 स्टील्थ पनडुब्बियां
नौसेना के प्रोजेक्ट 75 (आई) के तहत, भारत और जर्मनी, छह (06) स्टेल्थ पनडुब्बी बनाने की तैयारी कर रहे हैं. इसके लिए मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड (एमडीएल) और जर्मनी की थाइसेनक्रुप कंपनी (टीकेएमसी) के बीच सामरिक करार हो चुका है. इस प्रोजेक्ट की कुल कीमत करीब 08 बिलियन डॉलर यानी 72 हजार करोड़ है. इन पनडुब्बियों को मेक इन इंडिया के तहत एमडीएल में निर्माण करने की तैयारी है.
बेहद खास एआईपी तकनीक से लैस होंगी ये सबमरीन
रक्षा मंत्रालय ने एयर इंडिपेंडेंट प्रोपेलेंट (एआईपी) तकनीक से लैस छह खास पनडुब्बियों के लिए वर्ष 2017 में प्रोजेक्ट पी75 (इंडिया)की घोषणा की थी. इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने एमडीएल और एल एंड टी कंपनी को किसी विदेशी ओईएम यानी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्यूफैक्चरर के साथ करार करने की छूट दी थी. ऐसे में एमडीएल ने जर्मनी की थाइसेनक्रुप कंपनी से प्रोजेक्ट 75 (आई) के लिए पिछले वर्ष सितंबर में करार किया था.
एलएंडटी कंपनी ने स्पेन की नवांतिया से हाथ मिलाया था. लेकिन नवांतिया और एलएंडटी कंपनी, एआईपी तकनीक से लैस पनडुब्बियों को बनाने में नाकाम साबित हुई थी. ऐसे में रक्षा मंत्रालय ने एलएंडटी और नवांतिया ग्रुप को प्रोजेक्ट से बाहर करने का फैसला लिया था.
पारंपरिक डीजल पनडुब्बियों के बावजूद 02 महीने तक रह सकती हैं समंदर के नीचे
एआईपी तकनीक से लैस पनडुब्बियां, लंबे समय तक (करीब दो महीने तक) समंदर के नीचे रहकर ओपरेट कर सकती हैं. जबकि पारंपरिक (डीजल) पनडुब्बियों को समय-समय पर समंदर की सतह पर आना पड़ता है. सतह पर आने से पनडुब्बियां दुश्मन की नजर में आ जाती है. लेकिन स्टील्थ (एआईपी) तकनीक से पनडुब्बी के बारे में दुश्मन को कानों-कान खबर नहीं लगती.
1986 में राजीव गांधी सरकार ने की थी एचडीडब्लू सबमरीन डील
उल्लेखनीय है कि भारत और जर्मनी के बीच करीब 40 वर्ष बाद कोई बड़ा रक्षा सौदा होने जा रहा है. वर्ष 1986 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के दौरान भी दोनों देशों ने एचडीडब्लू सबमरीन (शिशुमार क्लास पनडुब्बियों) की डील की थी. लेकिन घूस और दलाली के चलते, इस सौदे की छह में से महज चार पनडुब्बियां नौसेना को मिल पाई थी. इनमें से 02 का निर्माण जर्मनी में हुआ था और बाकी 02 का एमडीएल में.
स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बी के बाद एमडीएल को दूसरा बड़ा सबमरीन प्रोजेक्ट
स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बी के बाद एमडीएल को दूसरा बड़ा सबमरीन प्रोजेक्ट मिलने जा रहा है. फ्रांस की मदद से एमडीएल ने छह स्कॉर्पीन (कलवरी) क्लास पनडुब्बी बनाकर भारतीय नौसेना को सौंप दी है. खास बात है कि भारतीय नौसेना की छह कलवरी (स्कोर्पीन) क्लास पनडुब्बियों को भी एआईपी तकनीक से लैस किया जा रहा है.
पिछले साल दिसंबर में डीआरडीओ द्वारा तैयार की गई एआईपी तकनीक को एलएंडटी कंपनी को ट्रांसफर (टीओटी) किया गया था. एलएंडटी के हजीरा (गुजरात) स्थित शिपयार्ड में इस एआईपी तकनीक को तैयार किया जा रहा है.

