Breaking News Reports

सीआरपीएफ ने माना चलाई Anti-riot गन, सरकार ने गोली चलाने से इसलिए किया इंकार

संसद में जंतर मंतर पर छात्रों के उग्र-प्रदर्शन पर हुई कार्रवाई को लेकर बवाल खड़ा हो गया है. बवाल इसलिए कि क्या, छात्रों पर गोली चलाई गई थी. सरकार का दावा है कि गोली नहीं चलाई गई थी. लेकिन विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि आरएएफ के जवानों ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया था.

दरअसल, ये एक बेहद तकनीकी मामला है. क्योंकि क्लासिक-टर्म में ‘गोली’, सिर्फ उसे बोला जाता है जिससे किसी की जान जा सकती है. नॉन-लीथल यानी ऐसा एम्युनिशन जिससे जान जाने का खतरा ना, हो लगने पर कोई चोट या दर्द हो, उसे गोली नहीं कहा जाता है. यही वजह है कि सरकार के मंत्री और सांसद, संसद में दावा कर रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों पर कोई गोली नहीं चली थी. 

नॉन-लीथल गन का इस्तेमाल करती है आरएएफ

दरअसल,रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) उग्र भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बैटन (लाठी) और टियर गैस के गोलों के अलावा पैलेट गन और एंटी-रायट गन (एआरजी) जैसे नॉन-लीथल हथियारों का इस्तेमाल करती है. आरएएफ के जवानों के हाथों में इंसास या फिर एके-47 जैसे हथियार नहीं होते हैं, जिनसे किसी की जान पर बन आए. 20 जुलाई को आरएएफ के एक जवान ने एंटी-रॉयट गन का इस्तेमाल किया था. शुरुआत में हालांकि, ये कहा गया था कि पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ है. 

आरएएफ जिन नॉन-लीथल हथियारों का इस्तेमाल करती है, यानी पैलेट गन और एआरजी, उन दोनों की मारक क्षमता या यूं कहें कि चोट पहुंचाने की क्षमता में भी अंतर है. अंतर इन गन्स में इस्तेमाल होने वाले एम्युनिशन में है.पैलेट गन के कार्टेज में जहां मैटेल या फिर लेड के छर्रे होते हैं, एंटी रायट गन में प्लास्टिक या फिर रबर के छर्रे होते हैं. ऐसे में पैलेट गन की मार थोड़ी तेज होती है. 

सीआरपीएफ डीजी ने ली जवानों की कार्रवाई की जिम्मेदारी

इस बीच, सीआरपीएफ डीजी जी पी सिंह का एक वीडियो सामने आया है जिसमें महानिदेशक ने फोर्स के जवानों के कार्यों की जिम्मेदारी खुल लेनी की बात कही है. हालांकि, वीडियो में पैलेट गन या जंतर मंतर पर ज्यादती का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि उसी संदर्भ में ये संबोधन किया है. सोमवार को सीआरपीएफ का 88 वां स्थापना दिवस था, उसी दिन का ये वीडियो बताया है. स्थापना दिवस के इस कार्यक्रम में मीडिया को आमंत्रित नहीं किया गया था. 

इस वीडियो में जी पी सिंह कहते सुने जा सकते हैं कि “मैं अपने बल के महानिदेशक (यानी सीआरपीएफ के प्रमुख) के तौर पर आप सभी जवानों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि चाहे कोई भी ऑपरेशनल बटालियन हो या कानून व्यवस्था से जुड़ी यूनिट हो, जो भी निर्णय आप राष्ट्रहित में या जनहित और बलहित में लेते हैं..जो भी एक्शन आप लेते हो…जो भी ‘बोनाफाइड’ ड्यूटी आप डिस्चार्ज करते हैं, उन सभी निर्णय का, उन सभी एक्शन का दायित्व मेरा है.”

सीाआरपीएफ डीजी ने आगे कहा कि “आप अपना काम निर्भय होकर करते रहें..जहां कहीं भी कोई जिम्मेदारी/दायित्व लेना होगा वो मैं बतौर महानिदेशक के तौर पर लेता हूं.”

टीएफए ने आपको सबसे पहले बताया था कि पैलेट गन चलाने वाले आरएएफ के जवानों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी. क्योंकि जवानों ने पैलेट गन चलाने के समय उपद्रवी भीड़ का नियंत्रित करने वाली सभी एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर) यानी तय-मानकों का पालन किया था. 

सूत्रों ने टीएफए को बताया है कि 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी रैंक के अधिकारी के आदेश पर रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों ने पैलेट गन चलाई थी. उससे पहले, हिंसक भीड़ को अनाउंसमेंट के जरिए चेतावनी, लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोलों को जरिए तितर बितर करने की कोशिश की गई थी. भीड़ ने पुलिस और आरएएफ के जवानों की चेतावनी को अनसुना किया और संसद की तरफ कूच करने की कोशिश कर रही थी इसलिए पैलेट गन का इस्तेमाल करना पड़ा.

पैलेट गन चलाने से पहले सीआरपीएफ ने ली थी डीसीपी से लिखित परमिशन

पैलेट गन या एंटी-रॉयच गन चलाने से पहले आरएएफ के एक डिप्टी कमांडेंट रैंक के अधिकारी ने दिल्ली पुलिस के डीसीपी से लिखित में परमिशन ली थी. क्योंकि दिल्ली पुलिस के एसीपी और डीसीपी के पास एक मजिस्ट्रेट की सीमित पावर भी हैं, जैसा कि यूएपी या फिर किसी राज्य में किसी जिला-मजिस्ट्रेट (डीएम) के पास होती हैं. 

जानकारी के मुताबिक, 20 जुलाई को आरएएफ के जवानों ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों के अलावा 55 नॉन-इलेक्ट्रिक सेल्स और 15 इलेक्ट्रिक सेल्स भी दागे थे. ये सभी भी नॉन-लीथल वेपन का कैटेगरी में आते हैं, जो आरएएफ के जवानों को दंगा नियंत्रित करने के दिए गए हैं. आरएएफ की तरफ से 20 जुलाई को दंगा रोकने के लिए की गई पूरी कार्रवाई पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है (डीडी एंट्री). आरएएफ के एक जवान ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया था. जवान ने सात (07) बुलेट्स का इस्तेमाल किया था, जिसके चलते तीन प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे. तीनों का दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज हुआ है. 

आरएएफ को एक्शन लेना की है पूरी एक एसओपी

दरअसल, आरएएफ के जवानों को अपने हथियारों के इस्तेमाल करने को लेकर पूरी एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेरिटंग प्रोसिजर) है. आखिर किन परिस्थितियों में और कैसे अपने हथियारों का इस्तेमाल करना है. क्योंकि आरएएफ के जवानों को बैटन (खास डंडे), वाटर कैनन, टीयर गैस यानी आंसू गैस के गोले और पैलेट गन से लैस किया गया है. किसी भी विरोध-प्रदर्शन के दौरान, भीड़ को नियंत्रित करने पहुंचे आरएएफ के सभी जवानों को पैलेट गन से लैस नहीं किया जाता है. एक कंपनी के कुछ जवानों के पास ही ऐसी पैलेट गन इस्तेमाल के लिए दी जाती है. 

पैलेट गन का विवाद सबसे पहले, करीब एक दशक पहले कश्मीर घाटी में सामने आया था. आतंकी सरगना बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद पूरी कश्मीर घाटी में जगह-जगह सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी हो रही थी. ऐसे में सीआरपीएफ ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया था. उस दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी पैलेट गन के छर्रों से घायल हुए थे.

पैलेट गन की एक बुलेट में करीब एक दर्जन छोटे-छोटे छर्रे होते हैं. ऐसे में लगने वाले के शरीर पर छोटे-छोटे कई घाव बन जाते हैं. सबसे ज्यादा मुश्किल आंख में लगने के कारण आती है. पैलेट गन की गोली अगर आंख के आस-पास लग जाए तो खासी मुश्किल हो सकती है. कश्मीर में जब स्थानीय लोगों की आंखों पर इसका असर पड़ा तो दुनियाभर में मानवाधिकार का सवाल उठने लगा. ऐसे में सुरक्षाबलों ने पैलेट गन का इस्तेमाल बेहद कम कर दिया. लेकिन जंतर मंतर पर तीन प्रदर्शनकारियों के घायल होने के बाद एक बार फिर पैलेट गन विवादों के घेरे में है. 

सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के मुताबिक, मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण, जंतर मंतर प्रकरण से जुड़ी पूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा.  सुप्रीम कोर्ट में सीआरपीएफ की तरफ से विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाएगी. गुरूवार को उच्चतम न्यायालय ने भी इस तरह के प्रकरण में उग्र भीड़ को कंट्रोल करने के लिए नए एसओपी बनाने का इशारा किया है. 

editor
India's premier platform for defence, security, conflict, strategic affairs and geopolitics.