भारत के दौरे पर आए जापान के समकक्ष शिंजीरो कोइजुमी को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘अभय-मुद्रा’ वाली महात्मा बुद्ध की मूर्ति भेंट की है. बौद्ध कला और साधना में अभय मुद्रा, ‘निर्भयता और आश्वासन’ का संकेत हैं. यानी जापान अपने दुश्मनों से कतई भयभीत ना हो और भारत का ‘आश्वासन’ की हमेशा जापान के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहेगा.
चीन और रूस से तनातनी के बीच, जापानी रक्षा मंत्री का भारत दौरा हुआ है. हाल के दिनों में विवादित कुरील द्वीप को लेकर रूस और जापान के बीच ठन गई है. सेनकाकू आईलैंड को लेकर जापान की चीन से भी तहासिक दुश्मनी रही है. दूसरी तरफ अमेरिका ने जापान को मिलने वाला सुरक्षा-चक्र वापस ले लिया है. ऐसे में जापान ने रक्षा क्षेत्र में भारत से संबंधों को गहराई देने के लिए शिंजीरो को दिल्ली भेजा है. (रूस से तनातनी, जापान का भारत की तरफ रुख)
भारत और जापान के रक्षा मंत्रियों का पहला साझा बयान जारी
गुरुवार को राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सीडीएस जनरल एन एस राजा सुब्रमणि और सेना के तीनों प्रमुखों की मौजूदगी में शिंजीरो के साथ आए जापानी प्रतिनिधिमंडल से गहन चर्चा की. इस दौरान दोनों देशों ने एक साझा बयान जारी किया और राजनाथ सिंह ने शिंजीरो को महात्मा बुद्ध की मूर्ति भेंट की. दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के स्तर पर ये पहला ज्वाइंट स्टेटमेंट है.
बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध की ‘अभय-मुद्रा’ को एक पवित्र हस्त-संकेत माना जाता है. यह शांति, सुरक्षा और भीतर व बाहर के भय को दूर करने का प्रतीक है।
हिंद-प्रशांत महासागर में भारत-जापान की दोस्ती शांति और स्थिरता का स्तंभ
भारत और जापान के रक्षा मंत्रियों के साझा बयान में कहा गया है कि “जापान-भारत विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी” के अंतर्गत रक्षा सहयोग के निरंतर सुदृढ़ीकरण का स्वागत करते हैं. इसमें रणनीतिक दृष्टिकोण साझा करने वाले दोनों देशों के संबंधित मंत्रालयों और सेवाओं के बीच सहयोग शामिल है और यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि के स्तंभों में से एक है.
जुलाई 2026 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों (नरेंद्र मोदी और सनाए ताकाइची) द्वारा जारी जापान-भारत संयुक्त वक्तव्य का स्मरण करते हुए, दोनों रक्षा मंत्रियों ने एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र को साकार करने के लिए अपने नेतृत्व में रक्षा सहयोग को और मजबूत बनाने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की.
चीन की तरफ इशारा, नेविगेशन और फ्लाइंग में ना खड़ी करे बाधा
दोनों मंत्रियों ने वैश्विक तनाव के इस दौर में दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा वातावरण के आकलन साझा करने के महत्व पर सहमति व्यक्त की. उन्होंने नौवहन और हवाई उड़ान की स्वतंत्रता और सुरक्षा में बाधा डालने वाली किसी भी एकतरफा कार्रवाई के साथ-साथ बल या दबाव द्वारा यथास्थिति को बदलने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध जताया.
दरअसल, चीन की नौसेना प्रशांत महासागर में सिनकाकू आईलैंड के करीब, जापान के (मिलिट्री) विमानों की फ्लाइंग में अड़ेंगे डालता है. ठीक उसी तरह ताइवान और साउथ चाइना सी में भी चीन, दूसरे देशों के समुद्री जहाजों के नेविगेशन में रूकावट खड़ी करता आया है. इसके अलावा, हाल में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने विवादित कुरिल द्वीप का दौरा कर प्रशांत महासागर में अपने इरादे साफ कर दिए हैं.
ऐसे में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक और प्रभावी ढंग से परिचालन सहयोग को परिपुष्ट करने पर सहमति व्यक्त की. तदनुसार, उन्होंने समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए जापान और भारत के रक्षा मंत्रालयों के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.
जापान की टेक्नोलॉजी और भारत की प्रोडक्शन क्षमता का होगा मिलन
दोनों मंत्रियों ने रणनीतिक और परिचालन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने वाले ठोस समुद्री सुरक्षा सहयोग को शीघ्रता से पूरा करने पर सहमति व्यक्त की. उन्होंने यह भी माना कि दोनों पक्षों को अपनी-अपनी संबंधित नीतियों के अनुसार, बारूदी सुरंगों को नष्ट करने की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए सामंजस्य को अधिकतम करना चाहिए और जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की उत्पादन क्षमताओं का लाभ उठाते हुए नौसेना पोत निर्माण और डिजाइन में संयुक्त विकास की संभावनाओं का पता लगाना चाहिए.
उन्होंने यह भी सहमति व्यक्त की कि दोनों पक्षों को रक्षा पोत निर्माण और संबंधित क्षेत्रों में एक-दूसरे की शक्तियों का लाभ उठाना चाहिए और “मेक इन इंडिया” के ढांचे के अंतर्गत भारत की उत्पादन क्षमताओं के जापान द्वारा उपयोग पर गहन चर्चा करनी चाहिए. दोनों मंत्रियों ने निकट भविष्य में पोत मरम्मत समझौते को अंतिम रूप देने सहित, पारस्परिक पोत मरम्मत सुविधाओं के प्रावधान को आगे बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की.
दोनों देशों की सेना के तीनोँ अंग करेंगे साझा युद्धाभ्यास
राजनाथ और शिंजीरो ने जापान और भारत द्वारा आयोजित द्विपक्षीय अभ्यासों के निरंतर विस्तार और गहनता का स्वागत किया, जिनमें जापान-भारत सेना अभ्यास धर्मा-गार्डियन (‘धर्म संरक्षक’) और जापान-भारत समुद्री अभ्यास “जिमेक्स” शामिल हैं. उन्होंने विशेष रूप से इस वर्ष आयोजित होने वाले जापान-भारत वायु सेना अभ्यास “वीर गार्डियन 26” के समन्वय में हो रही निरंतर प्रगति का स्वागत किया, जिसके तहत जापान वायु आत्मरक्षा बल के लड़ाकू विमान पहली बार भारत आएंगे और अभ्यास में भाग लेंगे.

