पाकिस्तान के सऊदी अरब और टर्की से हुए डिफेंस पैक्ट को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने खोखला करार दिया है. राजधानी दिल्ली में एक कॉन्क्लेव में सवाल का जवाब देते हुए जयशंकर ने साफ तौर से कहा कि ‘मक्का एग्रीमेंट’ को साइन करने वाले तीनों देशों को मिलिट्री ऑपरेशन्स (हमलों) का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा है.
भारत के विदेश मंत्री ने इशारो-इशारो में कह दिया कि भले मक्का एग्रीमेंट एक डिफेंस पैक्ट है लेकिन इसमें शामिल देश, एक दूसरे की सीधे सैन्य मदद करने से कतरा रहे हैं. जयशंकर का इशारा सऊदी अरब की तरफ था, जहां ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोही लगातार हमले कर रहे हैं.
सऊदी पर हूती विद्रोहियों के हमले जारी
हूती विद्रोहियों ने सऊदी के बंदरगाह से लेकर अरामको रिफाइनरी तक पर ड्रोन अटैक किए हैं, इंडस्ट्रियल टाउन के टाउन आग के हवाले कर दिए हैं. लेकिन मक्का पैक्ट के बाकी दोनों देशों (पाकिस्तान और टर्की) ने सऊदी की सैन्य मदद करना तो दूर इन हमलों पर चूं तक नहीं किया है.
दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी आए दिन अफगानिस्तान के तालिबान लड़ाकों के हमले झेलने पड़ रहे हैं. लेकिन सऊदी अरब और तुर्की ने एक भी बार अफगानिस्तान के तालिबान शासन के खिलाफ मुंह नहीं खोला है. यही वजह है कि भारतीय विदेश मंत्री ने मक्का पैक्ट की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए.
हाल में मक्का-मदीना के दौरे पर सऊदी अरब पहुंचे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस यानी प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान सहित तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के साथ डिफेंस एग्रीमेंट किया था. मक्का पैलेस में तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे. मक्का समझौते को दुनियाभर में ‘इस्लामिक नाटो’ का नाम दिया जा रहा था. क्योंकि एग्रीमेंट में कहा गया था कि “किसी एक पर हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.”
पाकिस्तान पर तालिबानी हमलों पर मक्का पैक्ट के देशों ने नहीं खोला मुंह
पाकिस्तान ने इस एग्रीमेंट को अफगानिस्तान और भारत के हमलों को ध्यान में रखकर किया था. क्योंकि पाकिस्तान को अभी भी ऑपरेशन सिंदूर पार्ट-2 का डर सता रहा है. लेकिन खास बात है कि मक्का समझौते में शामिल सऊदी अरब से भारत के मजबूत सामरिक संबंध हैं. ऐसे में इस बात का संभावना बेहद कम है कि भारत के हमलों से बचाने के लिए पाकिस्तान की मदद करने के लिए सऊदी अरब आएगा.
तुर्की जरूर अपने ड्रोन और दूसरे सैन्य साजो सामान पाकिस्तान को जरूर सप्लाई कर सकता है. जैसा तुर्किए ने ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025) के दौरान किया था. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने जिन ड्रोन से भारत पर हमला किया था, वे अधिकतर तुर्की ने सप्लाई किए थे.
क्या इस्लामिक नाटो बचा पाएगा टर्की को
तुर्की को इजरायल से बेहद डर लगता है. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन को लगता है कि गाजा, हिज्बुल्लाह और ईरान के बाद, इजरायल का अगला टारगेट टर्की होगा. ऐसे में तुर्की, अपने साथ सऊदी और पाकिस्तान का मिलाना चाहता है. इजरायल पहले ही सुन्नी देशों के ‘एक्सिस’ पर चिंता जता चुका है. ऐसे में इजरायल की चिंता सच होती दिखाई देने लगी है.
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए तीनों ने जो मक्का करार किया है, उसके बाद तीनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा था कि इस्लामिक एकता बनाए रखने के लिए यह समझौता किया गया है.
इस्लामिक एकता के लिए मचला बांग्लादेश का मन
उधर इस्लामिक एकता की आड़ में एक दूसरे पड़ोसी देश बांग्लादेश ने भी मक्का एग्रीमेंट में शामिल होने का मन बनाया है. क्योंकि बांग्लादेश की मौजूदा तारिक रहमान सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में राजनीतिक शरण लेना कतई पच नहीं पा रहा है.

