रूस के खिलाफ जंग लड़ रहे यूक्रेन की मदद करते-करते नॉर्वे की सेना की हालत खराब हो चुकी है. यूरोपीय देश नॉर्वे ने अपने सैनिकों के हक का मिलिट्री ग्लव्स यूक्रेन को भेज दिया है. जिसके कारण खुद नॉर्वे के सैनिक खाली हाथ हैं. नॉर्वे की सेना इन दिनों ग्लव्स की भारी कमी से जूझ रही है.
नॉर्वे के सैनिकों को आम काम वाले ग्लव्स पहनने पड़ रहे हैं, जो अक्सर फट जाते हैं. यूक्रेन को प्राथमिकता देने के कारण नॉर्वे की सेना के बजट में भारी कटौती की भी खबरें सामने आई हैं.
नाटो का संस्थापक देश नॉर्वे, रूस के साथ अपनी सीमा साझा करता है, जिसके कारण नॉर्वे नाटो के उत्तरी मोर्चे पर एक बहुत ही रणनीतिक और महत्वपूर्ण देश है. रूस को रोके रखने के लिए नॉर्वे, यूक्रेन को मिलिट्री टैक्टिकल ग्लव्स के साथ-साथ हजारों की संख्या में फील्ड कपड़े, हेलमेट, स्लीपिंग बैग और बुलेटप्रूफ जैकेट जैसे सैन्य उपकरण की मदद कर रहा है. नॉर्वे सरकार यूक्रेन की सेना को लगातार जरूरी रक्षा सामग्री और वित्तीय सहायता दे रही है.
कमजोर पड़ रही नॉर्वे की सेना, बजट डगमगाया
नॉर्वे की सेना से जुड़ा एक चौंकाने वाला रिपोर्ट सामने आई है. बताया जा रहा है कि “नॉर्वे भर के मिलिट्री डिपो में टैक्टिकल ग्लव्स खत्म हो गए हैं. ईस्टर से पहले ही पूरे देश में ग्लव्स का स्टॉक खत्म हो गया था.”
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कि “इसकी मुख्य वजह यूक्रेन को दी जाने वाली मदद को “सबसे ज़्यादा प्राथमिकता” देना है, जिससे नॉर्वेजियन सेना का ऑपरेटिंग बजट इतना कम पड़ गया कि वह किसी और चीज के लिए पैसे नहीं जुटा पाई.”
“इस कमी के कारण सेना को आम काम वाले ग्लव्स खरीदने पड़े, जो लड़ाई के हालात के हिसाब से नहीं बने थे. आम काम वाले ग्लव्स मतलब सशस्त्र बलों को स्टैंडर्ड वर्क ग्लव्स खरीदने पड़े—ऐसे गियर जो कभी युद्ध के मैदान के लिए नहीं बनाए गए थे.”
केएनएम हेराल्ड हारफाग्रे रिक्रूट स्कूल के मुताबिक, “सैनिकों को जो ग्लव्स का विकल्प दिया गया, वो बिलकुल टिक नहीं पाए, क्योंकि हार्डवेयर-स्टोर का सामान लड़ाई के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है. सैनिकों को टैक्टिकल ग्लव्स की ही आवश्यकता है.”
ग्लव्स ही नहीं, कपड़े और उपकरणों की भी भारी कमी
टैक्टिकल ग्लव्स की यह समस्या कोई अकेली समस्या नहीं है. दिसंबर 2025 में भी ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई थीं कि यूक्रेन को दी जा रही मिलिट्री मदद से नॉर्वे की अपनी ऑपरेशनल तैयारी बनाए रखने की क्षमता कम हो रही है, जिससे कपड़े और उपकरणों की भारी कमी हो रही है, जिसके कारण कुछ युद्धाभ्यास को रोकना पड़ा या ऐसी ट्रेनिंग की ही नहीं गई.
दरअसल नाटो के आर्कटिक अभियानों और ठंडे मौसम के युद्ध अभ्यासों में नॉर्वे की सेना मुख्य रूप से नेतृत्व करती है. नॉर्वे के बर्फीले इलाकों में नाटो बल भारी ठंड में लड़ने की कला सीखते हैं, जैसे आर्कटिक सेंट्री’ अभ्यास.
खास बात ये है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए नॉर्वे को नाटो का ‘प्रारंभिक चेतावनी रडार’ माना जाता है. ऐसे में अगर नॉर्वे की सेना कमजोर होती है, तो रूस का मनोबल बढ़ेगा. वो भी तब जब कई यूरोपीय देश ये मानते हैं कि अगर रूस युद्ध जीत गया तो वो किसी यूरोप के देश को टारगेट करेगा.
हालांकि ऐसी रिपोर्ट भी सामने आई थीं कि नॉर्वे अपने रक्षा बजट में भारी वृद्धि कर रहा है और उसकी योजना इसे नाटो द्वारा तय किए गए 3.5% के लक्ष्य से भी ऊपर ले जाने की है.
यूक्रेन को क्या-क्या सैन्य सहायता देता है नॉर्वे
नॉर्वे यूक्रेन का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सहयोगी है. नॉर्वे यूरोप को बैलिस्टिक मिसाइलों से बचाने के लिए 10 देशों के गठबंधन (जिसमें यूक्रेन भी शामिल है) का सक्रिय सदस्य भी है.
नॉर्वे ने 2023 से 2027 के बीच यूक्रेन के लिए 75 अरब नॉर्वेजियन क्रोनर (लगभग 6.7 अरब यूरो) के विशाल सहायता पैकेज की घोषणा की है. नॉर्वे यूक्रेन को एफ-16 लड़ाकू विमान, वायु रक्षा प्रणाली, और महत्वपूर्ण ऊर्जा व मानवीय सहायता प्रदान कर रहा है.
नॉर्वे टैक्टिकल ग्लव्स के अलावा यूक्रेनी सैनिकों को ठंड से बचाने के लिए भारी मात्रा में विंटरवियर और स्लीपिंग पैड भेजता है. नॉर्वे ने हजारों बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट यूक्रेन को दान किए हैं. नॉर्वे ने नीदरलैंड के साथ मिलकर यूक्रेन को एक पूरा फील्ड अस्पताल और सर्जिकल उपकरण दिए हैं. साथ ही नॉर्वे हथियार बनाने के लिए यूक्रेन को भारी आर्थिक मदद भी दे रहा है.
नॉर्वे नॉर्डिक देशों में सबसे अधिक यूक्रेनी शरणार्थियों को आश्रय देने वाला देश है. मौजूदा समय में नॉर्वे में 90,000 से अधिक यूक्रेनी नागरिक रह रहे हैं, जो युद्धग्रस्त इलाकों से आए हैं.

