फुटबॉल की दुनिया के बादशाह अर्जेंटीना की इंग्लैंड पर जीत और जश्न में फॉकलैंड द्वीप के पोस्ट को लेकर विवाद तेज हो गया है. अर्जेंटीना और ब्रिटेन के बीच हुए युद्ध और विवादित द्वीर की चिंगारी फुटबॉल के मैदान में भड़क गई.
इंग्लैंड को हराकर फाइनल में पहुंचने के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने मैदान पर ‘लास माल्विनास सन अर्जेंटीना’ (माल्विनास अर्जेंटीना का है) लिखा बैनर लहराया था. अर्जेंटीना में फॉकलैंड को माल्विनास कहा जाता है.
अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने विवादित फॉकलैंड द्वीप समूह पर संप्रभुता का दावा करने वाले बैनर के साथ तस्वीरें खिंचवाई. जिसके बाद इंग्लैंड (ब्रिटेन) भड़का हुआ है. ब्रिटेन ने फीफा से अर्जेंटीना की शिकायत की है. (https://www.instagram.com/reel/Da28411SOpC/?igsh=MW55NjRya3lkNzQxaw==)
फीफा वर्ल्ड कप फाइनल स्पेन से होना है, उससे पहले लियोनेल मेसी की टीम की मुश्किलें बढ़ गई हैं और मेसी के समर्थक प्रार्थना कर रहे हैं कि फाइनल से पहले अर्जेंटीना के खिलाड़ियों पर कोई सख्त एक्शन न लिया जाए.
अर्जेंटीना पर एक्शन लेने की मांग
फीफा वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड को हराने के बाद अर्जेंटीना की जीत एक बड़े अंतरराष्ट्रीय झगड़े में बदल गई है. अटलांटा में बुधवार को खेले गए विश्व कप सेमीफाइनल में अर्जेंटीना ने इंग्लैंड को 2-1 से हराया था.
मैच के बाद जश्न के दौरान अर्जेंटीना के खिलाड़ियों को एक दर्शक ने बैनर पकड़ा दिया. खुशी में झूमते खिलाड़ियों ने बैनर से साथ जश्न शुरु कर दिया. लेकिन बैनर पर जो लिखा था, उससे ब्रिटेन आगबबूला है.
बैनर पर लिखा था कि “लास माल्विनास सोन अर्जेंटिनास” यानि‘‘माल्विनास (फॉकलैंड) अर्जेंटीना का है.”
ब्रिटेन ने अर्जेंटीना की टीम पर अनुशासात्मक कार्रवाई की मांग की है. ब्रिटेन के व्यापार सचिव पीटर काइल ने कहा कि “खिलाड़ियों का व्यवहार पूरी तरह से अनुचित” था. राजनीति को फुटबॉल से अलग रखने की जरूरत है. विश्व कप का एक प्रमुख सिद्धांत यही है कि राजनीति फुटबॉल से अलग है. यह अब फीफा का मामला है. मुझे उम्मीद है कि फीफा इसकी जांच करेगा.”
इस घटना के बाद अर्जेंटीना-ब्रिटेन का पुराना विवाद फिर चर्चा में आ गया है.
ब्रिटेन-अर्जेंटीना में क्या है फॉकलैंड द्वीप विवाद
दक्षिण अटलांटिक में स्थित फॉकलैंड द्वीपसमूह ब्रिटेन के अधीन है, जिसकी आबादी लगभग 3,500 है. यह ब्रिटेन से लगभग 8,000 मील (13,000 किलोमीटर) और अर्जेंटीना से 300 मील (480 किलोमीटर) दूर स्थित है.
अर्जेंटीना कहता है कि साल 1833 में उससे ये द्वीप अवैध रूप से छीन लिए गए थे. तो ब्रिटेन का कहना है कि यह 1765 से उसके अधीन है. अर्जेंटीना ने 1982 में इस द्वीप समूह पर हमला किया था. इसके बाद 10 सप्ताह तक भीषण युद्ध चला था. अर्जेंटीना को युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था.
इस युद्ध में लगभग 650 अर्जेंटीना के सैनिक और 255 ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे.
अर्जेंटीना का कहना है कि ये द्वीप उसके पास होने चाहिए, क्योंकि ये उसके इलाके के करीब हैं, तो ब्रिटेन का तर्क है कि वहां रहने वाले लोग खुद को ब्रिटिश मानते हैं.
साल 2013 में इसे लेकर जनमत संग्रह भी हुआ था, जिसमें 99 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन के साथ रहने की इच्छा जताई थी.
ब्रिटेन का अर्जेंटीना पर सैन्य प्रतिबंध, 42 साल बाद मिला लड़ाकू विमान
1982 के फॉकलैंड युद्ध के बाद से ही इंग्लैंड ने अर्जेंटीना को किसी भी तरह के हथियार और मिलिट्री हार्डवेयर तक देने पर रोक लगा रखी थी. इतना ही नहीं इंग्लैंड ने दूसरे देशों को अर्जेंटीना को कोई भी ऐसा हथियार देने पर बैन लगा रखा था जिसमें उसके देश (इंग्लैंड) का कोई उपकरण लगा हो.
अपने राजनीतिक और राजनयिक रसूख के चलते इंग्लैंड ने दूसरे देशों का अर्जेंटीना से किसी भी तरह का रक्षा सहयोग करने पर रोक लगा रखी थी. क्योंकि अधिकतर देशों के फाइटर जेट में इंग्लैंड की कंपनी मार्टिन बेकर की इजेक्शन सीट लगी थी, ऐसे में अर्जेंटीना को पिछले 42 सालों से कोई नया फाइटर जेट नहीं मिल पाया था.
पिछले चार दशक में अर्जेंटीना के मिराज फाइटर जेट से लेकर सभी पुराने फाइटर जेट रिटायर हो चुके थे लेकिन कोई भी देश लड़ाकू विमान देने को तैयार नहीं था. ऐसे में भारत और चीन सैन्य सहयोग के लिए आगे आए.
भारत अपने स्वदेशी फाइटर जेट एलसीए तेजस को अर्जेंटीना को देने के लिए तैयार हो गया था. लेकिन उनमें भी इंग्लैंड की मार्टिन बेकर सीट लगी थी. ऐसे में भारत ने तेजस में रुस की इजेक्शन सीट लगाने की पेशकश की थी. साथ ही चीन भी पाकिस्तान की मदद से तैयार जेफ-17 फाइटर जेट देने के लिए तैयार था. लेकिन इससे अमेरिका की त्यौरियां चढ़ गई और डेनमार्क को अपने पुराने एफ-16 देने की इजाजत दे दी.
साल 2024 में अर्जेंटीना का 42 साल लंबा सैन्य वनवास समाप्त हो गया है. यूरोपीय देश डेनमार्क ने अपने पुराने एफ-16 लड़ाकू विमान दक्षिण अमेरिकी देश को बेचने का करार कर लिया. डेनमार्क ने ये लड़ाकू विमान अमेरिका से खरीदे थे और अब रिटायरमेंट के कगार पर थे. लेकिन अर्जेंटीना ने भारत और चीन से सैन्य संबंध बढ़ाने की कोशिश की तो पश्चिमी देश सतर्क हो गए और एफ-16 देने को तैयार हो गए.
अर्जेंटीना के लिए फाइटर जेट इसलिए भी बेहद जरूरी थे क्योंकि पड़ोसी देश चिली के पास भी एफ-16 फाइटर जेट हैं और ब्राजील भी स्वीडन से साब-ग्रिपेन लड़ाकू विमान ले रहा था.

