Breaking News Geopolitics

पनामा नहर पर चीन Vs ट्रंप, कब्जे की तैयारी

ईरान से मुद्दा पूरी तरह से सुलझाने में नाकाम रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से पनामा नहर के नाम पर चीन से रार छेड़ ली है. पनामा नहर का राग अलापते हुए ट्रंप ने वॉर्निंग देते हुए कहा है कि पनामा कैनाल पर चीन का कब्जा नहीं होने देगा अमेरिका.

पिछले साल जब ट्रंप ने सत्ता संभाली थी तो शपथ ग्रहण के मौके पर ही चीनी उपराष्ट्रपति के सामने कहा था कि पनामा अमेरिका की है, और अमेरिका की ही रहेगी. दरअसल ट्रंप पनामा नहर पर अमेरिका का अधिकार चाहते हैं, और लगातार चीन-रूस का नाम लेकर पनामा को धमकाते हैं.

लेकिन पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने भी ट्रंप की बात खारिज करते हुए कह दिया था कि पनामा नहर पनामा के लोगों की है, और रहेगी.

पनामा कैनाल का कंट्रोल पनामा को नहीं सौंपना चाहिए था: ट्रंप

नॉर्थ डकोटा के मेडोरा में थियोडोर रूजवेल्ट प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी के उद्घाटन के कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि “पनामा कैनाल देकर अमेरिका ने बहुत बड़ी गलती की. सबसे पहले जहाजों के लिए कीमतें चार गुना बढ़ा दीं. पनामा ने इससे सालों-साल बहुत पैसा कमाया.  पनामा को भारी आर्थिक फायदा हुआ. यह हमारी तरफ से कितनी बड़ी बेवकूफी थी.”

ट्रंप ने कहा, “अमेरिका अपने रणनीतिक हितों से जुड़ा यह मुद्दा किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं करेगा.”

पनामा नहर में चीन का प्रभाव नहीं बढ़ने देंगे: ट्रंप

पनामा के नाम पर ट्रंप ने सीधे तौर पर चीन को चेतावनी दे डाली है. ट्रंप ने कहा, पनामा कैनाल रणनीतिक जलमार्ग पर चीन अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका ऐसा बिलकुल नहीं होने देगा. 

इतिहास की बात की जाए तो साल 1977 में हुए टोरिजोस-कार्टर समझौते में अमेरिका ने पनामा कैनाल का कंट्रोल चरणबद्ध तरीके से पनामा को सौंपने का निर्णय किया था. फिर, साल 1999 में इस पनामा नहर का पूरा कंट्रोल पनामा के हाथों में चला गया था.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2025 में शपथ वाले दिन भी नहर के जरिए पनामा और चीन को धमकाया था. ट्रंप ने कहा था कि “पनामा नहर हमने पनामा को गिफ्ट किया था, लेकिन इसका संचालन चीन कर रहा है. हमने चीन को नहर नहीं दी थी और अब अमेरिका नहर को वापस ले लेगा.”

दरअसल अमेरिका का 14 फीसदी व्यापार पनामा नहर के जरिए ही होता है. अमेरिका के साथ ही दक्षिण अमेरिकी देशों का बड़ी संख्या में आयात-निर्यात भी पनामा नहर के जरिए ही होता है.

पनामा नहर और पनामा में क्या है चीन का रोल?

पनामा में चीनी कंपनियों की मौजूदगी है. हांगकांग की कंपनी सीके हचिसन पनामा नहर के दोनों सिरों पर स्थित बाल्बोआ और क्रिस्टोबल बंदरगाहों का संचालन कर रही थी. पनामा की सर्वोच्च अदालत ने जनवरी 2026 में इस अनुबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसके बाद बंदरगाह का संचालन पनामा के समुद्री प्राधिकरण ने अपने हाथों में ले लिया है.

अक्टूबर 2023 से सितंबर 2024 तक पनामा से होकर गुजरने वाले जहाजों में 21.4 फीसदी प्रोडक्ट चीन का था. अमेरिका के बाद चीन ही पनामा नहर का सबसे अधिक  इस्तेमाल करने वाला देश है.

हाल के वर्षों में चीन ने नहर के पास बंदरगाहों और टर्मिनलों में भी भारी निवेश किया. नहर से सटे पांच बंदरगाहों में से दो बाल्बोआ और क्रिस्टोबल बंदरगाह को साल 1997 से ही चीनी कंपनी हचिसन पोर्ट होल्डिंग्स की सहायक कंपनी संचालित कर रही थी. जिसे अब पनामा की कोर्ट ने इसे गैरकानूनी बताया दिया है.

पनामा नहर के अलावा चीनी कंपनी हुआवेई की पनामा में मजबूत कॉर्पोरेट उपस्थिति है. कंपनी ने 2011 से पनामा सिटी में अपना लैटिन अमेरिकी क्षेत्रीय मुख्यालय और कोलोन मुक्त क्षेत्र में एक वितरण केंद्र स्थापित किया है. इसके अलावा चीन की सरकारी कंपनियां बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत बंदरगाहों, कंटेनर टर्मिनलों और बुनियादी ढांचे के विकास में सक्रिय रूप से शामिल रही हैं. बैंक ऑफ चाइनासमेत कई चीनी बैंकों ने पनामा के वित्तीय केंद्र में अपनी शाखाएं स्थापित की हैं.

यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को आशंका है कि जिस तरह तेजी से चीन पनामा में अपनी जड़े फैला रहा है, उसके कारण अमेरिकी संप्रभुता को नुकसान पहुंच सकता है.

ट्रंप के दावों को खारिज कर चुके हैं पनामा के राष्ट्रपति

पनामा अमेरिका का एक अहम सहयोगी है और नहर ही उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है. पनामा के राष्ट्रपति और ट्रंप में ठीक-ठीक बनती भी है, पर ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से पहले ट्रंप और मुलिनो में ठनी दिख रही है.

कुछ महीने पहले भी पनामा के राष्ट्रपति ने ट्रंप की आशंकाओं को बेबुनियाद करार दिया था. मुलिनो ने कहा था, “नहर पर सिर्फ पनामा का संचालन है, चीन के संचालन और आधिपत्य की बात बेबुनियाद है. ये बात भी बिलकुल गलत है कि हम अमेरिकी जहाजों से ज्यादा कर लेते हैं.”

‘‘नहर का प्रत्येक वर्ग मीटर पनामा का है और आगे भी उनके देश का ही रहेगा, पनामा के लोगों के कई मुद्दों पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन जब हमारी नहर और हमारी संप्रभुता की बात आती है तो हम सभी एकजुट हैं.’’

82 किलोमीटर की नहर जिसने बदली दुनिया की अर्थव्यवस्था 

यह नहर एक बेहद जरूरी जलमार्ग है, जो अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है. इस नहर के चलते समुद्री व्यापार और परिवहन अधिक तेज और सस्ता हो गया है.  पनामा नहर का निर्माण साल 1881 में फ्रांस ने शुरू किया था, लेकिन साल 1904 में पनामा नहर बनाने की जिम्मेदारी अमेरिका ने संभाली और फिर साल 1914 में अमेरिकी इंजीनियर्स की मदद से बनाया गया था. इसके बाद पनामा नहर पर अमेरिका का ही नियंत्रण रहा, लेकिन साल 1999 में अमेरिका ने पनामा नहर का नियंत्रण पनामा की सरकार को सौंप दिया.यह नहर जहाजों को अमेरिका के केप हॉर्न से होकर जाने की जरुरत को खत्म करती है, जिससे 8,000-10,000 किलोमीटर का सफर बचता है. 

भारत के लिए क्यों जरूरी है पनामा नहर

इस नहर से ग्लोबल बिजनेस आसान बना है. शिपिंग और लॉजिस्टिक की लागत कम हुई है. ग्लोबल बिजनेस का 5% हिस्सा इसी से संचालित होता विशेष रूप से अमेरिका और एशिया के बीच बिजनेस का एक बड़ा और सस्ता जलमार्ग है.भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते व्यापार में पनामा नहर की भूमिका अहम है. नहर के जरिए सामान को सीधे प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर के बीच भेजा जा सकता है, जिससे समय और लागत बचती है. भारतीय प्रोडक्ट अमेरिका के पश्चिमी और पूर्वी तटों पर आसानी से पहुंच पाते हैं. अगर नहर बंद हो जाए तो जहाजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे लागत और समय बढ़ेगा.

editor
India's premier platform for defence, security, conflict, strategic affairs and geopolitics.