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ट्रंप ने Loosers से कराई वार्ता, बीजिंग को दिया क्रेडिट

By Nalini Tewari

40वें दिन मिडिल ईस्ट में अस्थाई शांति का माहौल है. अमेरिका-ईरान के बीच 02 सप्ताह की सीजफायर हो गया है. पाकिस्तान और उसके प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ उछल रहे हैं कि उनके कारण सीजफायर हुआ, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले बयान में युद्धविराम का क्रेडिट चीन को दिया है.

ट्रंप ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि तेहरान को मनाने के पीछे बीजिंग का हाथ रहा. चीन ने ही ईरान को सीजफायर के लिए राज़ी किया है. लेकिन इस बात में भी सच्चाई है कि ट्रंप ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए पाकिस्तानी फेल्ड (फील्ड) मार्शल असीम मुनीर को माध्यम बनाया.

ईरान और चीन के बीच अच्छी साझेदारी है. भीषण युद्ध को रोकने के लिए पर्दे की पीछे से चीन हरकत में था और बिचौलिए की भूमिका में पाकिस्तान था. चीन की ये कोशिश रंग लाई और आखिरकार तेहरान को मना लिया गया. 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच सीधी बातचीत होने की उम्मीद है.

चीन के कारण सीजफायर हुआ: ट्रंप

ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने सीजफायर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. लेकिन जिस प्रस्ताव और सीजफायर का हीरो पाकिस्तान बनने की कोशिश कर रहा है, उसका असली हीरो पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि “चीन ही वो देश ही, जिसने ईरान को सीजफायर के लिए तैयार किया है. चीन के कारण ही ईरान ने सीजफायर के लिए हामी भरी है.”

ट्रंप ने कहा, “उन्हें विश्वास है कि चीन की पहल के बिना यह सीजफायर संभव नहीं था.”

युद्ध रुकवाने में चीन की बैकडोर डिप्लोमेसी

जानकारी के मुताबिक चीन ने ही अमेरिका और ईरान, दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए दबाव बनाया और युद्धविराम में अहम भूमिका निभाई है.  चीन, ईरान को युद्धविराम के लिए मनाने की कोशिश में जुटा था और अंत में चीनी अधिकारियों को इसमें कामयाबी भी मिली.

ट्रंप ने चीन को ये क्रेडिट ऐसे वक्त में दिया है जब ईरान और अमेरिका दोनों ही दो हफ्ते के सीजफायर के लिए सहमत हो गए हैं. इस समझौते के तहत अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जल्द ही खोला जाएगा.

चीन ने सीधे तौर पर सामने आने के बजाय बैकडोर डिप्लोमेसी का रास्ता अपनाया. उसने पाकिस्तान, तुर्किए और मिस्र जैसे देशों के जरिए ईरान तक संदेश पहुंचाया. इन मध्यस्थों के जरिए चीन लगातार ईरान को यह समझाने की कोशिश की, कि युद्ध न सिर्फ क्षेत्र बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक है.

संयुक्त राष्ट्र में चीन-रूस ने किया अमेरिका का खेल, ईरान का दिया साथ

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बहरीन की तरफ से ईरान के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें सैन्य हस्तक्षेप करके स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने की मांग की गई थी. हालांकि रूस और चीन ने इस पर वीटो कर दिया. 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव पर 11 वोट पक्ष में, जबकि 2 (रूस और चीन) वोट विरोध में पड़े, वहीं पाकिस्तान और कोलंबिया ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.

रूस के राजदूत वासिली नेबेंजिया ने कहा कि प्रस्ताव ‘मूल रूप से गलत और खतरनाक’ है क्योंकि उसमें ईरान पर किए गए अमेरिका और इजरायल के ‘अवैध हमलों’ का जिक्र तक नहीं था. तो चीन के राजदूत फू कोंग ने कहा कि प्रस्ताव ‘संघर्ष की जड़ों और पूरी तस्वीर’ को संतुलित तरीके से नहीं दर्शाता.

रूस और चीन के प्रतिनिधियों ने यूएन में ये संदेश दिया कि अगर ईरान पर हमले जारी रहे तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पूरी तरह बिगड़ जाएगा.

होर्मुज पर सैन्य एक्शन के लिए अमेरिका अलग-थलग पड़ गया. नाटो और यूरोप के देशों ने पहले ही ट्रंप को झटका दे दिया था और यूएन में भी रूस-चीन के वीटो के बाद होर्मुज खोलने के लिए सेना के इस्तेमाल पर वीटो लगा दिया गया. वहीं खाड़ी देश भी अमेरिका पर दबाव बना रहे थे, कि उनके कारण ईरान के हमलों से नुकसान झेलना पड़ रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति खुद अपने देश में घिरे हुए थे. ऐसे में कुल मिलाकर चारों ओर से दबाव पड़ा और रिजीम चेंज-सभ्यता खत्म करने के दावे कर रहे ट्रंप को डेडलाइन से कुछ घंटे पहले ईरान की शर्तें माननी पड़ीं.

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