रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-ईरान जंग में दुश्मन के छक्के छुड़ाने के बावजूद, भारत में ड्रोन्स की कोई अलग फोर्स नहीं बनने जा रही है. ड्रोन और यूएवी (अनमैन्ड एरियल व्हीकल), वायुसेना का हिस्सा बने रहेंगे. खुद वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए पी सिंह ने साफ कर दिया है. हाल में अमेरिका ने अपने ड्रोन्स और रिमोटली पायलट एयरक्राफ्ट (आरपीए) के लिए अलग ऑटोनोमस फोर्स का गठन किया है.
वायु-सेना दिवस (08 अक्टूबर) से पहले राजधानी दिल्ली में सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए एयर चीफ ने कहा कि ड्रोन्स, वायुसेना की अलग-अलग यूनिट्स का हिस्सा बने रहेंगे.
रूस-यूक्रेन और मिडिल-ईस्ट जंग में ड्रोन्स ने बदला रुख
उल्लेखनीय है कि अमेरिका जैसे सुपर पावर के खिलाफ ईरान के शहीद ड्रोन ने जंग का पूरा रूख बदल दिया है. पिछले चार साल से ड्रोन की ताकत के जरिए यूक्रेन जैसे देश ने रूस जैसे मिलिट्री सुपर पावर को बांधकर रखा है. ऐसे में ये सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि ड्रोन वॉरफेयर के लिए भारत कितना तैयार है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने किए था ड्रोन अटैक
ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025) के दौरान, पाकिस्तान ने सिचायिन ग्लेशियर से लेकर जम्मू कश्मीर और पंजाब से लेकर राजस्थान और गुजरात के रण ऑफ कच्छ तक 1000 ड्रोन से हमला किया. लेकिन भारतीय सेना की एंटी-एयरक्राफ्ट गन और काउंटर ड्रोन सिस्टम ने इस हमले को नाकाम कर दिया. बावजूद इसके, वायुसेना ने अपनी खुद की अलग कोई ऑटोनोमस फोर्स बनाने से साफ इंकार कर दिया है, जैसा कि अमेरिका ने किया है.
थलसेना ने तैयार की तीन नई ड्रोन फोर्स
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय (थल) सेना ने हालांकि, अपनी अलग ड्रोन फोर्स खड़ी करने का संकल्प लिया था. शुरुआत हुई अशनी प्लाटून, भैरव बटालियन और दिव्यास्त्र बैटरी से. ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहले कारगिल विजय दिवस के मौके पर तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इन तीनों ड्रोन फोर्स को बनाने की घोषणा की थी.
हर इंफेंट्री बटालियन में बनी अशनी प्लाटून
ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के ड्रोन अटैक के बाद भारतीय सेना ने सभी इन्फैंट्री बटालियन में एक खास ड्रोन प्लाटून बनाकर खड़ी कर दी है. महज कुछ हफ्तों के भीतर भारतीय सेना ने अपनी इस खास ‘अश्नि’ (अशनी) प्लाटून को दुनिया के सामने पेश भी कर दिया. खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान सीमा के करीब जैसलमेर में इस खास ड्रोन प्लाटून का उद्घाटन किया. पौराणिक इतिहास में ‘अश्नि’ को देवराज इंद्र का हथियार माना जाता है, जिसे बज्र के नाम से भी जाना जाता है. भारतीय सेना की अश्नि प्लाटून में 20 सैनिक हैं, जिन्हें एफपीवी से लेकर सर्विलांस ड्रोन और स्वार्म ड्रोन सहित लोएटरिंग म्युनिशन में ट्रेनिंग दी गई है. ये सेना की हरेक इंफ्रेंटी बटालियन का हिस्सा हैं. भारतीय सेना की इस समय में करीब-करीब 380 इन्फेंट्री बटालियन हैं.
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन का जमकर इस्तेमाल किया गया है. ये ड्रोन, सर्विलांस के साथ ही हैंड ग्रेनेड तक ले जाने में सक्षम हैं.यूक्रेन ने इन एफपीबी ड्रोन से रूस के सैनिकों को चुन-चुनकर मारा है. ये कम दूरी पर दुश्मन को टारगेट करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. यानी जब दुश्मन के साथ आमने सामने की जंग हो.
स्वार्म ड्रोन, कई छोटे ड्रोन का एक झुंड है जो दुश्मन के सैनिकों के बड़े दल सहित टैंक या फिर गाड़ियों के काफिले पर हमला बोल सकता है. लोएटरिंग म्युनिशन में ड्रोन को हाई एक्सप्लोसिव बम से लैस किया जाता है. ये कामकाजी ड्रोन की तरह अपने लक्ष्य पर जाकर तबाह हो जाता है और दुश्मन को जबरदस्त नुकसान पहुंचाता है. ये ईरान के शहीद ड्रोन जैसे होते हैं, जो डेढ़ से दो हजार किलोमीटर तक वार करते हैं. इन ड्रोन ने अमेरिका, इजरायल और दूसरे खाड़ी देशों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया और जंग का रुख बदल दिया.
भारतीय सेना के जखीरे में आज 50 हजार एफपीबी और स्वार्म ड्रोन हैं. लेकिन भारतीय सेना को अभी भी कामकाजी ड्रोन की कमी खल रही है. हालांकि, कुछ स्वदेशी कंपनियों ने ईरान के शहीद ड्रोन जैसे लोएटरिंग म्युनिशन बनाने का दावा जरूर किया है. लेकिन अमेरिका-ईरान जंग को देखते हुए भारत को ऐसे आत्मघाती ड्रोन की बड़ी संख्या में जरूरत है.
तोपखाने ने तैयार की बेहद खास शक्तिबाण यूनिट, ऑर्मर्ड में ड्रोन के लिए शौर्य स्क्वाड्रन
अशनी प्लाटून के साथ भारतीय सेना ने शक्तिबाण यूनिट बनाकर तैयार कर ली हैं. ये ड्रोन यूनिट, भारतीय सेना की आर्टलरी यानी तोपखाने के साथ. इनकी संख्या 15-20 हैं और इन्हें स्वार्म ड्रोन और लोएटरिंग म्युनिशन और लंबी दूरी के यूएवी ऑपरेट करने के लिए खड़ा किया गया है. तोपखाने के अलावा आर्मर्ड यानी टैंक रेजीमेंट के लिए भी सेना ने शौर्य स्क्वाड्रन तैयार की हैं. ये इसलिए क्योंकि, रूस यूक्रेन युद्ध में टैंक, आईसीवी और मिलिट्री व्हीकल्स को बड़ी संख्या में ड्रोन से अटैक कर तबाह किया गया. ऐसे में जंग के मैदान में खतरों को भांपकर सेना के टैंक और दूसरे मैकेनाइज्ड कॉलम दुश्मन के सीने पर वार कर सकेंगे. इसके अलावा सेना की डिवीजन स्तर पर जो खास भैरव बटालियन तैयार की गई हैं, उसमें तैनात हर कमांडो को ड्रोन ऑपरेट करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है.
क्योंकि भारतीय सेना के पास इस समय करीब 50 हजार ड्रोन हैं और आने वाले 2-3 साल में ये संख्या लगभग डबल यानी एक लाख हो जाएगी. ऐसे में एफपीबी, लोएटरिंग म्युनिशन, स्वार्म ड्रोन या रिमोट-लैस पायलट एयरक्राफ्ट के इंटीग्रेशन के लिए सेना ने एक नई बाज बटालियन खड़ी करना का फैसला किया है. ये सेना की ड्रोन से जुड़ी सबसे नई यूनिट है. ये सभी यूनिट ड्रोन अटैक से जुड़ी हैं यानी जब भारत को दुश्मन देश पर ड्रोन अटैक करना है. इसके अलावा दुश्मन के ड्रोन को काउंटर करने के लिए भी भारतीय सेना, स्वदेशी कंपनियों के साथ मिलकर ऐसी तकनीक ईजाद कर रही हैं.


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